उन्होंने अपना अधिकांश समय इसी क्षेत्र में प्रचार और जनसंपर्क में लगाया, देहरादून के गांवों में कम ही गए। नतीजा यह निकला कि ठाकुर यशपाल ने एक बार फिर दिग्गज नेता महावीर त्यागी को हराकर चुनावी पंडितों के होश उड़ा दिए। ठाकुर यशपाल ने कभी बड़ी चुनावी सभा नहीं की। वे अपनी सभा घासमंडी, सब्जी मंडी, चौक बाजार, कचहरी के बाहर और रेलवे स्टेशन के बाहर नुक्कड़ सभाओं की तरह करते थे।
किसी दुकानदार से स्टूल मांगा और हो गई सभा। इलाका ग्रामीण हुआ तो घोड़े पर बैठे-बैठे ही भाषण दे डालते। संसद सत्र में वे जमकर बोला करते। लोकसभा अध्यक्षों को उन्हें बैठाने में खासी दिक्कतें पेश आती।
घर आए थे वीवी गिरी
1971 की मई में पसीने में लथपथ होते हुए भी उन्होंने हरिद्वार में गंगा स्नान कर लिया। उन्हें जबरदस्त निमोनिया और टाइफाइड हो गया। कई जगह लंबा इलाज हुआ, पर वे ठीक नहीं हो पाए। 1972 में कम उम्र में ही उन्होंने संसार से विदाई ली। पुराने नेता बताते थे कि उनकी अंत्येष्टि के बाद राष्ट्रपति वीवी गिरी उनके घर सांत्वना देने आए थे।