भाजपा में शिफ्ट हुआ वामपंथी दलों का वोट
टिहरी संसदीय क्षेत्र की कुछ विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने के बावजूद वामपंथी दलों का ग्राफ लगातार गिरता ही चला गया। भाजपा के उदय के बाद वामपंथियों का वोट बैंक धीरे-धीरे भाजपा की ओर शिफ्ट होता गया। 1989 तक इस सीट पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले वामपंथी दल अगले लोकसभा चुनाव तक सिमट गए। 1989 के लोकसभा चुनाव में 20 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करने वाले दल वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 0.49% मत में ही सिमट गए।
‘धनबल नहीं होने से चुनाव नहीं जीत पाए’
संसाधनों की कमी खासकर धनबल के कारण वामपंथी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पाए। कार्यकर्ताओं का जमीनी स्तर पर संगठन है। जनपक्षीय मुद्दों को लेकर हमेशा से ही संघर्षरत रहे हैं, लेकिन जिस तरह से धनबल का प्रयोग बढ़ रहा, ऐसे में सीमित संसाधन वाले दलों के लिए चुनाव जीतना संभव नहीं है। 70 और 80 के दशक में वामपंथी दलों ने टिहरी, देवप्रयाग और हरिद्वार सीट पर विस चुनाव में जीत दर्ज की थी।
- जय प्रकाश पांडे, राज्य कमेटी सदस्य, भाकपा
वामपंथी मजदूर, किसान और वंचित लोगों के हितों के लिए हमेशा खड़ी रही है। पार्टी पहाड़ के लोगों के लिए हमेशा संघर्षरत रही है। चुनाव महंगे हो गए हैं, जिससे हम पिछड़ रहे हैं। धनबल का प्रयोग ज्यादा हो रहा है। राजनीतिक दलों ने सांप्रदायिक धुव्रीकरण, जातिवाद को आगे किया है। राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को गुमराह किया है। राष्ट्रवाद का मतलब तो गरीबों के अधिकारों की रक्षा करना है। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है और फिर अपने आप को राष्ट्रवादी कहा जा रहा है। देश के साथ ही उत्तराखंड में भी इंडिया गठबंधन है।
-समर भंडारी, राज्य कमेटी के सदस्य, भाकपा माले