इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि जो भी जानकारी समिति को भेजी जा रही है, उसमें संबंधित जिले के जिलाधिकारी के हस्ताक्षर होने चाहिए, लेकिन कई जिलों से प्रशासनिक अधिकारियों ने ही अपने हस्ताक्षर कर रिपोर्ट भेज दी है।समिति देखना चाहती है कि राज्य में भू-कानून में परिवर्तन के बाद कितनी जमीनों की खरीद-फरोख्त हुई। जिन लोगों ने उद्योग, अस्पताल, होटल आदि के नाम पर जमीन ली थी, क्या उन्होंने संबंधित संस्थाएं वहां खड़ी भी की हैं या नहीं।
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इसके अलावा इन उद्योगों में कितने स्थानीय लोगों को रोजगार मिला, किस वर्ष में कितनी जमीन बिकी, इत्यादि सूचनाएं मांगी गई थीं। सुभाष कुमार ने बताया कि कुछ ऐसे मामले भी संज्ञान में आए हैं, जिनमें उद्योग या अस्पताल के नाम पर जमीन ली गई और अब वहां फार्म हाउस खड़े कर दिए गए हैं। जिलों से इस संबंध में भी सूचनाएं मांगी गई थीं, जो समिति को नहीं मिली हैं। उन्होंने कहा कि जिलों से अब दस दिन के भीतर पुन: रिपोर्ट देने को कहा गया है। ताकि आगे की कार्रवाई की जा सके।
राजनीति खूब, सुझाव देने में कंजूसी
सवा करोड़ की जनसंख्या वाले प्रदेश में समिति को प्राप्त हुए मात्र दो सौ सुझाव।
भू-कानून के परीक्षण और अध्ययन के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति ने पिछले दिनों आम लोगों, संस्थाओं और तमाम स्टेक होल्डर्स से इस संबंध में सुझाव आमंत्रित किए थे। सवा करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश में समिति को मात्र दो सौ सुझाव प्राप्त हुए।
भू-कानून पर सबसे अधिक हल्ला मचाने वाली कांग्रेस पार्टी की ओर से इस संबंध में समिति को कोई सुझाव ही नहीं दिया गया। जबकि यूकेडी ने एक लाइन का सुझाव दिया है, जिसमें कहा गया है कि हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भी भू-कानून लागू होना चाहिए।