उत्तराखंड में पर्वतीय चकबंदी का खाका तैयार कर लिया गया है। सात बैठकों और तीन राज्यों के प्रावधानों के अध्ययन के बाद तैयार हुए इस ड्राफ्ट अधिनियम में पर्वतीय क्षेत्रों में तीन चक तक बनाने के प्रावधान रखे गए हैं।
इससे भी बेहतर बात यह है कि 250 ऐसे गांवों से सहमति मिल गई है जो चकबंदी लागू करने के लिए तैयार हैं। ड्राफ्ट में अनिवार्य के साथ ही स्वैच्छिक चकबंदी का प्रावधान भी है। चकबंदी के इस ड्राफ्ट में पर्वतीय जिलों में खेती की जमीन को तीन श्रेणियों में बांटा गया है।
पर्वतीय क्षेत्र में वनों की भूमि का अलग वर्ग रखा गया है और इसमें भी अलग चक बनाने का कानूनी प्रावधान किया गया है। इसी तरह गांव के आसपास की खेती योग्य भूमि को दो अलग-अलग वर्ग में बांटा गया है। इन दोनों वर्गों में चक बनाने की सुविधा दी गई है। इस तरह से पर्वतीय जिलों में तीन तरह के चक बनाए जा सकेंगे। यह देश में अपने-आप में अनूठी व्यवस्था होगी।
चकबंदी में गांव वालों की सहमति को भी कानूनी जामा पहनाया गया है। हर गांव में एक सलाहकार समिति बनेगी और अधिकारी इस समिति को साथ लेकर ही चक बना पाएंगे। एबसेंटी लैंडलॉर्ड या गांव छोड़ चुके लोगों की जमीन का अलग से चक बनाया जा सकेगा।
चकबंदी लागू होने पर पर्वतीय जिलों में राजस्व जमीन को भी खेती की जमीन में शामिल किया जा सकेगा। असल में पर्वतीय जिलों में सीढ़ीनुमा खेत हैं और ऐसे में हर खेत में ऐसी जमीन है जिस पर खेती नहीं होती। यह जमीन सरकारी मानी जाती है। ड्राफ्ट में इस बात का प्रावधान है कि इस जमीन को चक में शामिल किया जाए।
व्यवसायिक जमीन को चकों में शामिल नहीं किया जाएगा। चार धाम यात्रा रूट पर कस्बों में तब्दील हो चुके गांवों में इस तरह की काफी जमीन है।
सालों से अटका रहा है मामला
यह स्वीकार किया जा रहा है कि चकबंदी न होने के कारण भी पहाड़ की खेती चौपट हो रही है। राज्य गठन के बाद से ही प्रदेश में पर्वतीय जिलों में चकबंदी की कोशिश की जा रही है पर 1960 के बाद से बंदोबस्त न होने और पर्वतीय जिलों में कृषि भूमि के कई प्रकार होने के कारण मामला अधर में लटका रहा। पर्वतीय जिलों के लिए अनिवार्य चकबंदी की मांग भी की जाती रही पर विरोध के डर से सरकारें इसमें हाथ डालने से बचती रही।
हिमाचल के सिर्फ सोलन जिले में लागू है चकबंदी
पड़ोस का राज्य हिमाचल भी 1970 से अभी तक पूरे प्रदेश में चकबंदी लागू नहीं कर पाया। केदार सिंह रावत के मुताबिक हिमाचल में सोलन में चकबंदी लागू है। समिति ने असल में पर्वतीय जिलों में चकबंदी का स्वरूप देखने के लिए हिमाचल का अध्ययन किया। यहां से मायूसी हाथ लगने पर अरुणाचल प्रदेश के एक्ट का अध्ययन किया गया पर इससे भी खास सहायता नहीं मिली।
बंदोबस्त की खास जरूरत नहीं
चकबंदी से पहले बंदोबस्त की खास जरूरत नहीं होगी। कारण यह है कि चकबंदी के लिए हर गांव का डिजीटाइज मैप बनेगा। प्रदेश में टिहरी और उत्तरकाशी में 1960 में बंदोबस्त हुआ था।
चकबंदी कानून में आत्मा तो उत्तर प्रदेश के अधिनियम की है पर स्थानीय परिस्थितियों और विशेषताओं के अनुसार उसमें बदलाव किए गए हैं। समिति ने सात से अधिक बैठकें की और तीन राज्यों की स्थिति का अध्ययन किया। मंगलवार को यह ड्राफ्ट मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा। समिति का गठन दो जनवरी, 2015 को मुख्यमंत्री हरीश रावत के निर्देश पर किया गया था।
- केदार सिंह रावत, पर्वतीय चकबंदी सलाहकार समिति के अध्यक्ष
2016 तक 250 गांव
केदार सिंह रावत के मुताबिक समिति को करीब 250 गांवों से चकबंदी की सहमति मिल गई है। 2016 तक इन गांवों में चकबंदी कराकर कानूनी रूप दे दिया जाएगा।
अब आगे क्या
अब गेंद सरकार के पाले में हैं। इस ड्राफ्ट विधेयक को सरकार को विधानसभा के पटल पर रखना होगा। अधिनियम का स्वरूप लेने के बाद ही आगे की कार्यवाही की शुरूआत होगी। सरकार इसे गैरसैंण में दो नवंबर से प्रस्तावित विधानसभा सत्र में भी रख सकती है। बंदोबस्त के लिए विभागीय ढांचा तैयार किया जा चुका है।