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कारगिल की कहानी: जांबाज की जुबानी

Sat, 26 Jul 2014 08:01 PM IST
सतीश जोशी ‘सत्तू’/अमर उजाला, चंपावत
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आज शौर्य दिवस यानी कारगिल युद्ध के जीत की 15वीं वर्षगांठ है। संपूर्ण देश में युद्ध में शहीद सैनिकों की शहादत को बड़ी शिद्दत से याद किया जाएगा।
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युद्ध के समय सीमा क्षेत्र में अपने प्राणों की बाजी लगाने और घायल होने वाले जांबाजों की बेहतरी के लिए घोषणाएं तो तमाम की जाती हैं, लेकिन यह देखने की जहमत कोई नहीं उठाता है कि उन घोषणाओं को अमलीजामा पहनाया गया या नहीं।

चंपावत जिला मुख्यालय में कास्मेटिक की दुकान चलाने वाले दान सिंह मेहता भी इसी सरकारी बेरुखी का शिकार हैं।

केंद्र सरकार की ओर से उन्हें पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी और ग्रीन कार्ड देने का वायदा किया गया था, लेकिन 15 साल बाद भी इन वायदों की कोई खबर किसी स्तर से नहीं ली गई है। उन्होंने 2003 में घर आकर कास्मेटिक की दुकान खोली।
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तीन दुश्मनों को किया था ढेर
25 जुलाई 1999 का दिन याद कर 46 वर्षीय दान सिंह मेहता की भुजाएं आज भी फड़कने लगती हैं। युद्ध में सीने और दांए पांव में गोली लगने के बावजूद दान सिंह ने हिम्मत नहीं हारी।

उन्होंने द्रास सेक्टर के तुरतुक में मोर्टार गन से दुश्मन के तीन सैनिकों को ढेर कर दिया था।

उपेक्षा का शिकार बना शहीद स्मारक
जिले के बनबसा में शहीद खीम सिंह कुंवर का स्मारक उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। वर्षों से इस स्मारक का रंग-रोगन तो दूर सफाई तक नहीं की जा सकी है।

2001 में बनबसा व्यापार मंडल ने स्मारक पर जयपुर से मंगवाकर शहीद की मूर्ति की स्थापना की थी। तब से जनप्रतिनिधियों, सेना यहां तक कि सैनिक कल्याण समिति ने भी शहीद स्मारक की सुध नहीं ली है।

पत्नी से पहले माता-पिता को मिले हक
कारगिल युद्ध के शहीद खीम सिंह कुंवर की माता लक्ष्मी देवी को अपने जांबाज पुत्र पर गर्व है। बड़े बेटे के शहीद होने के बावजूद उन्होंने अपने छोटे पुत्र को भी सेना में भेजा।
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शहीद की मां का कहना है कि शहीदों की पत्नियों को सुविधाएं मिलनी लाजमी हैं, परंतु उनके वृद्ध माता-पिता को भी सम्मान और उचित पैसा मिलना चाहिए। उनका कहना है कि शहीद पर पत्नी से पहला हक मां का है।
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