उत्तरकाशी की हर्षिल घाटी के काश्तकारों ने दून में 24 से 26 सितंबर तक होने वाले अंतरराष्ट्रीय सेब महोत्सव का बहिष्कार किया है। किसान झाला स्थित कोल्ड स्टोर का संचालन नहीं किए जाने से आक्रोशित हैं।
हर्षिल घाटी के आठ गांव हर्षिल, झाला, सुक्की, मुखबा, पुराली, जसपुर, बगोरी व धराली के सेब काश्तकारों में झाला स्थित कोल्ड स्टोर का संचालन नहीं होने से रोष है। काश्तकार अनुबंध खत्म होने के बाद से कोल्ड स्टोर के शीघ्र संचालन की मांग कर रहे हैं। बावजूद इसके अब तक भी कोल्ड स्टोर के संचालन के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है।
काश्तकार जंगली जानवरों के उत्पात से भी परेशान हैं। उपला टकनौर जन मंच के अध्यक्ष माधवेंद्र रावत, काश्तकार मोहन राणा, संजय सिंह, सचेंद्र पंवार, दिनेश रावत, भवानी आदि ने समस्याओं के निस्तारण के लिए सकारात्मक कार्रवाई नहीं होने वन सरपंच, जैव विविधता संरक्षण समिति व ईको डेवलपमेंट कमेटी के पदों से भी त्यागपत्र देने की चेेतावनी दी।
अभी तक राज्य के कुल सेब उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा देहरादून और उत्तरकाशी से आता है। अब नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली, पौड़ी, टिहरी और रुद्रप्रयाग में नए बाग विकसित होंगे। उत्तराखंड सेब उत्पादक एवं विपणन सहकारी संघ ने इन जिलों में सेब उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कार्ययोजना तैयार की है।
राज्य समेकित सहकारी विकास परियोजना के तहत 18 सहकारी समितियों का गठन कर इससे करीब 30 हजार किसानों को जोड़ा जाएगा। सातों जिलों में सेब के नए बाग विकसित करने के लिए क्षेत्र में पहले से काम कर रही जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की एजेंसियों से अनुबंध किया जाएगा। जो किसानों को बाग विकसित करने में हर प्रकार की सहायता उपलब्ध कराएंगी।
नए बाग लगाने वाले किसानों को दीन दयाल उपाध्याय कृषि कल्याण योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाएगा, जिसे किसान अगले तीन साल में चुका सकेंगे। योजना के तहत एक हजार नए बाग लगाए जाएंगे और एक हजार पुराने बागों का सुधारीकरण किया जाएगा। हर जिले में सौ से अधिक बाग लगाने का लक्ष्य है।
18 माह में फल देने लगेंगे पौधे
राज्य में विकसित होने वाले तमाम नए बागों में नई तकनीक के प्रयोग के साथ कम समय में अधिक उत्पादन देने वाले पौधे रोपित किए जाएंगे। इसमें अल्ट्रा हाइडेंसिटी प्लांट लगाए जाएंगे और सीड लिंक टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जाएगा। इस तकनीक से पौधे 18 माह में फल देने लगते हैं।
उत्तराखंड दो से तीन मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर की औसत उपज के साथ देश में उत्पादित कुल सेब का लगभग तीन प्रतिशत योगदान देता है, जो देश की औसत उत्पादकता 7.73 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। इसे कैसे दोगुना किया जाए फेडरेशन ने इसकी पूरी कार्ययोजना तैयार की है। आने वाले समय में ‘उत्तराखंड सेब’ एक ब्रांड के रूप में देश दुनिया के बाजारों में बिकेगा।
- विपिन पैन्युली, सचिव, उत्तराखंड सेब उत्पादक एवं विपणन सहकारी संघ