कैंटीन संचालकों का कैंटीन चलाना मुश्किल
राज्य में भाजपा सरकार बनने के कुछ महीने बाद विभिन्न कैंटीन को टेंडर के जरिए दूसरे स्वयं सहायता समूहों को सौंप दिया गया। समय पर सब्सिडी वाला बजट न मिलने से कैंटीन संचालकों को कैंटीन चलाना मुश्किल हो रहा है। संचालकों का कहना है कि कोरोना काल के बाद और महंगाई बढ़ने से अब 20 रुपए में थाली उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा है। दून अस्पताल वाली कैंटीन तो कोरोना काल के पहले ही बंद हो गई थी, उसकी जगह अब स्टोर बना हुआ है।
इसी तरह, एमडीडीए कॉम्पलेक्स घंटाघर, विकास भवन और ट्रांसपोर्टनगर आईएसबीटी में भी ग्राहक कम मिल रहे हैं। विकास भवन स्थित कैंटीन चलाने वाली धरा संस्था की फरजाना ने कहा कि कोरोना के बाद ग्राहक भी कम आ रहे हैं। व्यवसायिक सिलिंडर, खानपान व दूसरी चीजों के दाम बढ़ने से अब 20 रुपए प्रति थाली के हिसाब से कैंटीन चलाना मुश्किल हो रहा है। वहीं, सचिवालय स्थित कैंटीन की संचालक सर्वशक्ति महिला स्वयं सहायता समूह की सीमा ने बताया कि शुरू से ही नॉन सब्सिडी के आधार पर कैंटीन चला रहे हैं। पहले 30 रुपए प्रति थाली थी अब महंगाई बढ़ने पर इसे 40 रुपए प्रति थाली कर दिया गया।
यह थी विशेषता
- 20 रुपए की थाली में चार रोटी, चावल, दाल, सब्जी, चटनी या अचार। इसमें दो रोटी मंडुवे की भी। खीर या अतिरिक्त रोटी-चावल लेने पर अतिरिक्त रुपए देने होते हैं।
- हफ्ते में एक दिन पूरी पहाड़ी थाली, जिसमें चटनी, मंडुवे की रोटी, झंगोरे की खीर आदि शामिल रहते हैं।
- इंदिरा अम्मा कैंटीन के जरिए स्थानीय उत्पादों को मिल रहा था पहले अच्छा प्रचार और बाजार।