अंग्रेजों की उनपर कड़ी निगरानी रही, लेकिन जेल से छूटने के बाद वह पानी के जहाज से कलकत्ता पहुंच गए। यहां भी अंग्रेजों की नजर से नहीं बचे तो फिर से जेल जाना पड़ा। इस पूरी समयावधि में घर वालों को उनके जीने मरने की कोई खबर नहीं रही। सात साल बाद जब घर लौटे तो घरवालों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वर्तमान में वह अपने दो बेटों के भरे पूरे परिवार के साथ जीवन जी रहे हैं। संवाद
स्वतंत्रता सेनानी मुरली सिंह रावत कहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार से अच्छी पेंशन मिल रही है। कोई गिला शिकवा नहीं है। वह युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि जब भी देश को जरूरत पड़े, देश के काम आएं। देश से बड़ा कुछ नहीं है। उनके पौत्र चंद्रमोहन सिंह बताते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर में उनके दादा मुरली सिंह भी कोरोना की चपेट में आ गए थे।
डाक्टरों की सलाह पर उन्हें होम आइसोलेट रखा गया। 103 साल की उम्र में उन्होंने कोरोना को भी मात दे दी। आईएनए के संघर्ष से जुड़े दस्तावेज भी उन्होंने संभालकर रखे हुए हैं, जो भी उनसे मिलने घर पहुंचता है वह बड़े स्नेह से सभी से मिलते हैं।