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'नई' आबादी से बदला उत्तराखंड का चुनावी गणित

Sat, 08 Mar 2014 11:05 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड की राजनीतिक जमीन भी यहां के भौगोलिक परिदृश्य सी उबड़-खाबड़ दिखती है।
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यूपी से अलग होकर पांच लोकसभा सीटें उत्तराखंड के खाते में आई थी। यूं तो उत्तराखंड की राजनीतिक पहचान उसके गढ़वाल-कुमाऊं के क्षेत्रीय और ठाकुर-ब्राह्मण के जातीय समीकरण से होती रही है।

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लेकिन वर्तमान परिस्थिति में यह समीकरण तेजी से दरक रहा है। तीन लोकसभा सीट हरिद्वार, नैनीताल और टिहरी लोकसभा में नए परिसीमन और नई आबादी से चुनावी गणित बदला है।
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जहां राजनीतिक दलों को चुनावी फसल काटने के लिए अधिक जुताई, अच्छे बीज और अच्छी खाद का इस्तेमाल करना होगा।
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लोकसभा हरिद्वार सीट पर एक नजर

पुरुष मतदाता- 843641, महिला मतदाता- 709666, कुल- 1553307

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हरिद्वार से सांसद हरीश रावत के सूबे का मुख्यमंत्री बन जाने से चुनाव में राजनीतिक रस्साकसी तय है। हरिद्वार के मतदाताओं के लिए कहा जाता है कि उन्होंने कभी सांसद रिपीट नहीं किया।

ऐसे में तय है कि हरीश रावत नहीं होंगे, लेकिन सीट कांग्रेस से छिन जाए हरीश रावत कतई नहीं चाहेंगे। सीट पर पहाड़-मैदान की लड़ाई भी लड़ी जाती है लेकिन अल्मोड़ा से लगातार हारने के बाद हरीश रावत को इसी चुनावी मैदान में सफलता मिली।

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बदली परिस्थिति में यहां मुस्लिम और दलित मतदाता अहम भूमिका में हैं। हालांकि श्यामपुर, रायवाला, रायपुर, ऋषिकेश के इलाके पर्वतीय प्रतिनिधित्व करते हैं।

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उत्तराखंड में कांग्रेस, भाजपा केसाथ समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के लिए भी हरिद्वार के मायने हैं।

लोकसभा नैनीताल सीट पर एक नजर

पुरुष मतदाता- 819386, महिला मतदाता- 718409, कुल- 1537795

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नैनीताल लोकसभा सीट मैदान के साथ पर्वतीय क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व करती है। यहां भी दूसरे राज्यों से आकर बसे लोगों ने राजनीतिक तस्वीर बदली है। कांग्रेस के केसी सिंह बाबा लगातार दो बार से सांसद हैं।

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यह सीट पूरे देश में एनडी तिवारी के चुनाव क्षेत्र के रूप में पहचान रखती है। तिवारी 1980 और 1999 में यहां कांग्रेस से सांसद रहे तो 1996 में अपनी पार्टी तिवारी कांग्रेस से जीते।

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इसी सीट पर तिवारी पर 1991 में राजनीतिक दाग भी लगा। जब बीजेपी के बलराज पासी ने उन्हें हराया। भाजपा से 1998 में इला पंत ने नैनीताल का प्रतिनिधित्व किया।

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1984 में सत्येंद्र चंद्र गुड़िया और 1989 में डॉ. महेंद्र सिंह पाल कांग्रेस से सांसद रहे। परंपरागत ढंग से यह सीट कांग्रेस के खाते में ही मानी जाती रही है।

यहां गैर पर्वतीय मतदाता निर्णायक भूमिका में है। इस सीट पर भी यूपी की राजनीति का प्रभाव साफ दिखता है।
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लोकसभा टिहरी गढ़वाल सीट पर एक नजर

पुरुष मतदाता- 675797, महिला मतदाता- 609274, कुल- 1285071

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टिहरी लोकसभा सीट परंपरागत ढंग से राजघराने से जुड़ी रही है जिसका फायदा बारी-बारी से कांग्रेस-बीजेपी को मिलता रहा है। 1957, 1962, 1967 मानवेंद्र शाह कांग्रेस से सांसद रहे। 1971 में यहां कांग्रेस से परिपूर्णानंद पैनोली सांसद रहे।

1977 और 1980 में कांग्रेस के टीएस नेगी, फिर कांग्रेस के ब्रह्मदत्त 1984, 1989 के बाद 1991, 1996, 1998, और 1999 के चुनाव में यहां बीजेपी से लड़े राजा मानवेन्द्र शाह का कब्जा रहा।

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा पहली बार 2004 में इस सीट से लड़े और हारे। मानवेन्द्र शाह की मृत्यु के बाद 2007 के उपचुनाव में विजय बहुगुणा चुनाव जीते। फिर 2009 में विजय बहुगुणा लोकसभा पहुंचे।

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बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने पर बेटे साकेत बहुगुणा ने सीट पर कब्जा बरकरार रखना चाहा लेकिन बीजेपी से लड़ी रानी माला राजलक्ष्मी शाह उपचुनाव जीत गईं। नए परिसीमन के बाद इस सीट की प्रकृति बदली है।

देहरादून का बड़ा हिस्सा इसी सीट में शामिल हैं। जहां तेजी से बढ़ी रही मिली जुली आबादी चुनावी समीकरण प्रभावित करेगी।
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