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अमर उजाला ‘हिंदी है हम’ अभियान : साहित्य और मनोरंजन के आगे हिंदी के लिए जहां और भी है...

Tue, 01 Sep 2020 02:00 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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लीलाधर जगूड़ी - फोटो : File Photo
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साहित्य और मनोरंजन से आगे हिंदी के लिए असीमित संभावनाओं का जहान है। बाजार के एक बड़े हिस्से ने हिंदी की ताकत को पहचाना है और इसी का असर है कि कभी एक-दो राज्यों तक सिमटी हिंदी आज देश के 23-24 राज्यों में बोली जाती है। पिछले कुछ वर्षों में हिंदी बाजार की भाषा भी बनी है। अभी इसमें लगातार विस्तार हो रहा है। यह बात जरूर है कि हिंदी के सामने कई तरह की चुनौतियां भी हैं। उच्च शिक्षा और शोध में हिंदी की उपेक्षा अभी जारी है लेकिन दूसरे कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हिंदी ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। 

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अमर उजाला ‘हिंदी है हम’ अभियान के तहत आयोजित वेबिनार में हिंदी से जुड़े विशेषज्ञों ने यह बातें कहीं। वेबिनार में पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी, प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर हटवाल और मुकेश नौटियाल शामिल रहे। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे बाजार और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, हिंदी अपने आप आगे चलेगी। अंग्रेजी की बड़े पैमाने पर पूछ सिर्फ इसीलिए है क्योंकि वह बाजार की भाषा है और उसमें रोजगार के अवसरों की उपलब्धता ज्यादा है। 

हिंदी को कमतर आंकना होगी सांस्कृतिक भूल  : जगूड़ी 

पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि हिंदी को कमतर आंकना सांस्कृतिक भूल है। देश और दुनिया में हिंदी को आगे बढ़ाने में सिनेमा ने भी अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, अंग्रेजी ने हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को नुकसान पहुंचाया है। अंग्रेजी से हमारा बैर नहीं है लेकिन हिंदी की कीमत पर अंग्रेजी को आगे बढ़ाया जाना बिल्कुल भी उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि कई देशों में बच्चे हायर एजूकेशन और रिसर्च अपनी भाषा में कर रहे हैं लेकिन हिंदी इस मामले में काफी पिछड़ी हुई है। शुरुआती हिंदी की बाजार में अच्छी किताबें भी नहीं है, जिसके कारण बच्चों में एक स्वाभाविक आकर्षण भी कम है।
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उन्होंने डिक्शनरी की कमी को भी हिंदी के लिए नुकसानदायक माना। उन्होंने कहा कि 1935 के बाद हिंदी की हिंदी के नए शब्दों को जोड़ते हुए डिक्शनरी नहीं बनी है। वहीं, अंग्रेजी में ऑक्सफोर्ड हर साल नए शब्द जोड़ते हुए डिक्शनरी तैयार करता है। इससे हिंदी के कई नए शब्द आम आदमी तक नहीं पहुंच पाते हैं। हिंदी को लेकर अब भी हीन भावना है लेकिन जैसे-जैसे यह रोजगार और रोजी-रोटी से जुड़ रही है, इसका स्तर भी ऊंचा उठ रहा है। 

करोड़ों लोगों की भाषा के बावजूद हिंदी को नहीं मिला सम्मान : नौटियाल 

वरिष्ठ साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि रोजगार और अवसरों के रास्ते खुलने के बाद ही हिंदी उच्च शिक्षा और शोध की भाषा बन सकेगी। ज्यादातर सक्षम देश अपनी भाषाओं में ज्ञान व शोध की पुस्तकों को ला चुके हैं। भारत में भी इसके प्रयास हुए लेकिन इतने बड़े भूभाग की भाषा होने के बावजूद हिंदी को वह सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वो हकदार है। आज भी समाज पर अंग्रेजी हावी है।

विज्ञान और कानून जैसे विषयों की पढ़ाई हिंदी में कर पाना बेहद मुश्किल है जबकि अंग्रेजी इन सब चीजों के लिए एक आसान विकल्प उपलब्ध करवाती है। उन्होंने कहा कि 1991 में बाजार खुलने से हिंदी को आगे बढ़ने का अवसर मिला। बाजार ने हिंदी की ताकत को समझा और आज हिंदी बाजार की एक प्रमुख भाषा है।

हिंदी से लोगों को रोजी-रोटी मिल रही है। गूगल, फेसबुक जैसी बड़ी कंपनियां भी हिंदी की ताकत को पहचानकर भारत में अधिकतम हिंदी में काम करने पर जोर दे रही है। उन्होंने कहा कि हिंदी के सामने चुनौतियां हैं लेकिन बाजार बढ़ने के बाद हिंदी को पूरे देश की भाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता। 

ज्ञान और शोध की भाषा नहीं बन पाई हिंदी : डॉ. हटवाल 

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर हटवाल ने कहा कि हिंदी का साहित्य और मनोरंजन की भाषा होना एक तरह की सच्चाई है। ज्ञान विज्ञान की भाषा के रूप में हिंदी उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई, जहां उसे होना चाहिए था। सरकारी और प्राइवेट स्कूल में भी हिंदी उपेक्षित है। ज्यादातर देश अपनी भाषाओं में किताबें तैयार कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने हिंदी के विकास के लिए धरातल पर काम न होने का मुद्दा भी उठाया। कहा कि हिंदी की कमियों को दूर करने की जरूरत है। अंग्रेजी के सामने हिंदी को सम्मान देना होगा। अंग्रेजी के सामने आज भी हिंदी को दीन हीन समझा जाता है।

बाजार भी हिंदी को काफी कमतर आंकता है। हिंदी बोलने वालों की कमी नहीं है लेकिन हम आज तक उसकी ताकत को नहीं पहचान पाए हैं। बाजार ने धीरे-धीरे उसकी ताकत को पहचानना शुरू कर दिया है और इसलिए पिछले कुछ समय में सारी चीजें हिंदी की तरफ बढ़ रही हैं। उसके बावजूद अंग्रेजी के सामने हिंदी आज भी उपेक्षित और निचले स्तर की भाषा मानी जाती है। हमें इसी मानसिकता से निपटना होगा। अकेले भारत में करोड़ों लोग हिंदी बोलते हैं, उसके बावजूद हिंदी वहां तक नहीं पहुंच पाई, जहां उसे होना चाहिए था। यह भी सच है कि जैसे-जैसे हिंदी में हमारे रोल मॉडल तैयार होंगे, सबकी अभिरुचि उसकी तरफ बढ़ेगी और उसका फायदा हिंदी के प्रसार को होगा। 

तीनों साहित्यकारों की कविताएं...

 - बच्चा सोता है हिलाने से राजा जागता है। - पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी
- कसम खाए बिना जहां किसी बात को सच ना माना जाए और उसके बाद भी सच्चाई संदिग्ध हो जहां कानून को भी यकीन ना हो अपराधी को भी वहां घबराना स्वभाविक है। - पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी
- पिछले कुछ वर्षों से किसी ने भी नहीं चाहा कि हमारी बेटियां हों युद्ध, महामारी, मानव विनाश को रोक लिया बेटियों ने खुद ब खुद पैदा होकर। - डॉ. नंदकिशोर हटवाल
- रोशन और रिवाज बैठे ऊंघते हैं छांव में शहरी हवा बहने लगी है आज मेरे गांव में वीरान पनघट पंचघर परमेश्वरों का पस्त है लग गया केबल कनेक्शन गांव घर में मस्त है। -मुकेश नौटियाल

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