सरयू का कहना है कि मैं तमिलियन हूं, लेकिन मुझसे कोई पूछे की मुझे कौनसी भाषा पसंद है तो मेरा जवाब हिंदी होगा। हिंदी ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है। यही वजह है कि मैं हिंदी में ही बात करना पसंद करती हूं। 28 साल की सरयू श्रीनिवासन हिंदी नुक्कड़ नाटकों के जरिए जागरूकता अभियान चलाती है। ग्रेजुएशन के समय लेडी इरविन कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में वह ड्रामेटिक्स सोसाइटी का हिस्सा थीं। हिंदी ड्रामा में अपने कॉलेज का कई जगह प्रतिनिधित्व किया। राष्ट्रीय स्तर की नाटक प्रतियोगिता में उनके निर्देशित हास्य नाटक को प्रथम पुरस्कार मिला। सरयू हिंदी में कविताएं और गीत भी लिखती हैं। सरयू कहती है कि हिंदी की वजह से वह यह पुरस्कार मिले हैं। मैं आगे भी इसको बढ़ावा देने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करूंगी।
डॉ. राकेश के घर सजती है हिंदी के विद्वानों की सभा
हरिद्वार में हिंदी भाषा के विद्वानों का जिक्र होते ही डॉ. विष्णुदत्त राकेश का नाम सहज रूप से उभर आता है। उनका रचना संसार बहुत फैला है। गुरुकुल कांगड़ी विवि के मानविकी संकाय अध्यक्ष एवं विवि पत्रकारिता संकाय के निदेशक, संस्कृत अकादमी, उत्तराखंड संस्कृत विवि एवं उत्तराखंड संस्कृति कार्य परिषदों के सदस्य भी रह चुके हैं। अस्सी वर्षीय आचार्य के कनखल स्थित आवास पर हिंदी विद्वानों और साहित्यकारों का आना जाना आज भी लगा रहता है।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य से डॉ. राकेश का गहरा रिश्ता रहा है। उनके छात्र न केवल बड़े बड़े पदों पर आसीन हैं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें अखिल भारतीय भवानी प्रसाद सम्मान, साहित्य परिषद सम्मान आदि अनेक पुरस्कार मिले हैं। मृदुभाषी डॉ. राकेश दो दर्जन से अधिक ग्रंथों के रचयिता हैं। उनकी चर्चित कृतियों में देवरात, श्रुतिपरणा, नभग, पर्ण गंधा, दसमहाविद्या मीमांसा आदि शामिल हैं। आचार्य राकेश ने निर्गुणपंथ साहित्य, रीतिकाल के ध्वनिवादी हिंदी आचार्यों, हिंदी साहित्य का मध्यकाल जैसे ग्रंथ लिखे हैं। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी और उत्तराखंड के प्रसिद्ध डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल पर उन्होंने छह-छह खंडों की ग्रंथावलियां लिखी हैं। आचार्य डा. विष्णुदत्त राकेश ने अखाड़ों के गुरुओं पर भी बृहद ग्रंथ लिखे हैं। धाराप्रवाह वक्ता डॉ. राकेश को हिंदी साहित्य का चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है।
हिंदी फिल्में देखने की शौकीन रहीं यूक्रेन की विक्टोरिया भारतीय संस्कृति की इस कदर मुरीद हुईं कि यही अपना घर बसा लिया। जन्मदिन पर विक्टोरिया की मां ने उनसे तोहफा मांगने को कहा तो उन्होंने झट से भारत जाने के लिए टिकट के पैसे मांग लिए। सन 2000 में विक्टोरिया केवल छह महीने का वीजा लेकर भारत आई थी, लेकिन भारत की बोली-बानी में वह ऐसे रमी कि हिंदी के साथ उन्होंने संस्कृत भी सीखी। वह देश-विदेश में आज भगवद्गीता के प्रचार-प्रसार करती है। 49 वर्षीय विक्टोरिया 2004 से भारत में है।
यहां रहने के साथ ही उन्होंने अपना भारतीय नाम वेनु रति देवी दासी बदला। इंजीनियरिंग की विद्यार्थी व भू-वैज्ञानिक वेनु की हिंदी सुनकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह विदेशी हैं। वेनु मानती हैं कि बच्चों के हिंदी बोलने में हिचक करने के पीछे माता-पिता के साथ ही सरकार का सबसे दोष है।
माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी ही स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। और सरकार यह नहीं समझ रही कि बच्चे ही आने वाला वो भविष्य है जिनके जरिए हम अपनी संस्कृति, बोली-भाषा को जिंदा रख सकते हैं। बतौर वेनु भारत की इतनी सरल -सुलझी व मधुर भाषा हिंदी को सीखने के बाद मैंने यहां के बारे में कितना कुछ जाना। जब विदेशी होकर मुझे यहां कि भाषा संस्कृति से प्रेम हो सकता है। तो यहां के लोगों को क्यों नहीं?