1930 में ब्रिटिश नागरिक पॉल ब्रंटन ने भारत की यात्रा योगियों की खोज की थी। ब्रंटन की खोज अरुणाचल प्रदेश में रमन महार्षि से मुलाकात पर खत्म हुई। ब्रंटन ने इसके बाद 1935 में सर्च इन सीक्रेट इंडिया के नाम से किताब लिखी और पश्चिम से एक तरह से रमन महार्षि का परिचय कराया। ब्रंटन की इस किताब की ढाई लाख से अधिक प्रतियां बिकीं। इसी तरह स्वामी परमानंद की एक योगी की आत्मकथा की रिकार्ड बिक्री हुई। इसके साथ ही भारत के नाम से एक और नाम जुड़ा-स्प्रिचुअल इंडिया।
इसी तरह स्वामी विवेकानंद की उत्तराखंड यात्रा अल्मोड़ा में शारदा मठ और मायावती आश्रम के रुप में सामने आई। स्वामियों, मनीषियों और जिज्ञासुओं की ये यात्राएं हिमालय में खोज और बोध के रुप में सामने आईं। आदि शंकराचार्य से लेकर इस आधुनिक समय तक हिमालय अपने एक खास बोध और आकर्षण से इस तरह की यात्राओं को प्रेरित करता रहा है। अब समय में बदलाव के साथ ही यह हिमालय का यह आकर्षण कम भी होता जा रहा है। हिमालय के लिए इस बोध को बनाए रखने की चुनौती है और हिमालय के संत भी यह महसूस कर रहे हैं कि हिमालय का एक संकल्प यह भी होना चाहिए....
2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देहरादून में हुई इन्वेस्टर्स मीट में प्रदेश सरकार और अन्य देशों के प्रतिनिधियों से कहा था कि उत्तराखंड को स्प्रिचुअल इको जोन बनाए। पीएम का इशारा शायद आध्यात्मिक पारिस्थितिकी क्षेत्र के रूप में विकसित करने की ओर था। इसी एसईजेड के एक छोर पर आध्यात्मिक साधना के केंद्र मठ, मंदिर और आश्रम हैं तो दूसरे छोर पर योग के अभ्यास और उससे जुड़ी परंपराओं के साक्षात्कार की भावभूमि है।
हिमालय सदियों से इस भूमिका को निभाता भी रहा है। आदि शंकराचार्य से लेकर वर्तमान में भी आध्यात्म और जिज्ञासा से प्रेरित लोगाें का रुख हिमालय की ओर होता रहा है। ऋषिकेश में हर साल आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग आयोजन में बढ़ने वाले प्रतिभागियों की संख्या इस ओर इशारा भी कर रही हैं। इतना होने पर कोई कसक है तो उभर कर सामने आ रही है। अपनी इस थाती को हिमालय खो रहा है। उत्तरकाशी में लंबे समय से रह रहे स्वामी सुुंदरानंद के मुताबिक हिमालय में अब कम तपस्वी मिलते हैं। आश्रमों के स्वरूप में विस्तार हुआ है लेकिन आध्यात्म पर विश्वास को और पुख्ता करने में कमजोर भी साबित हुए हैं। डेस्टीनेशन स्प्रिचुअल उत्तराखंड और अन्य हिमालयी राज्यों के सामने इस थाती को सहेज कर रखने की चुनौती हैं। योग इसकी एक सीढ़ी है और इस सीढ़ी का सही उपयोग दूसरे दरवाजों को भी खोल सकता है। यही स्थिति हिमाचल और अन्य हिमालयी राज्यों की भी है। योग के नाम पर भीड़ चाल नुकसान पहुंचाएंगी। इसी तरह नए केंद्र सामने उभर तक सामने न आए तो परेशानी होगी।
हिमालय का आकर्षण कम नहीं हुआ, दृष्टि बदलने की जरूरत
आध्यात्म में हिमालय के आकर्षण का क्या कारण है?
- हिमालय अनंत प्रेरणाओं का स्रोत है। मैं खुद गंगोत्री में इसी तरह की प्रेरणा के बल पर पहुंचा और यहीं का होकर रह गया। सदियों से यही प्रेरणा है जो लोगाें को अपनी ओर आकर्षित करती रही है।
क्या अब हिमालय का यह आकर्षण कम हुआ है?
- हिमालय का आकर्षण कम नही हुआ है। हमारी दृष्टि बदल रही है। ऐसा नहीं है कि कुछ काम नहीं हो रहा है। महात्मा लोग लगातार काम कर रहे हैं, लेकिन ये महात्मा लोग खुलकर सामने आने से बचते हैं। इन्हें खोजना पड़ता है। इनकी परीक्षा में पास होना पड़ता है। आज भी जिनकी दृष्टि है वे हिमालय की ओर खिंचे चले आ रहे हैं।
हिमालय को आध्यात्म और योग का केंद्र बनाने के लिए क्या किया जाए?
- हिमालय तो आध्यात्म और योग का केंद्र है ही। इसकी पहचान को और पुख्ता करने के लिए अपनी परंपराओं को और सही तरीके से सामने रखा जाए। हमने यहां गंगोत्री में आर्ट गैलरी और ध्यान केंद्र स्थापित किया है। 13 सितंबर को पूजा होगी। इस गैलरी में मेरे डेढ़ लाख से अधिक हिमालय की विभिन्न छवियों, गूढ़ रहस्यों से संबंधित फोटो प्रदर्शित किए गए हैं। इसी तरह के विश्वसनीय और बेहतर प्रयोग और भी होने चाहिए। हिमालय शक्ति का भंडार है। इस शक्ति की आराधना सही मन से होनी चाहिए।
उत्तराखंड
- वर्तमान में ऋषिकेश एक योग केंद्र के रूप में उभर कर सामने आया है। इसी तरह केदारनाथ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कुटी में ध्यान लगाया तो अब इस कुटी की बुकिंग भी लगातार बढ़ती ही जा रही है। हरिद्वार के अलावा चाराें धामों, हेमकुंड साहिब सहित अन्य केंद्रों की ओर भी लोग रुख कर हैं। इसके अलावा जागेश्वर मंदिर समूह, देवी के शक्ति पीट, डिवाइन लाइफ सोसायटी सहित अन्य संस्थाओं के केंद्र भी प्रदेश में लोगोें को अपनी ओर खींच रहे हैं। योग के केंद्र अब ऋषिकेश ही नहीं उत्तरकाशी सहित अन्य जिलों में भी स्थापित हो रहे हैं।
हिमाचल
- हिमाचल में शक्ति पीठ भारी संख्या में हैं। एक अध्ययन के मुताबिक हिमाचल में दस हजार से अधिक पूजा स्थल हैं। ज्वालामुखी देवी के अलावा बाबा गोरखनाथ, अष्टभुजा देवी सहित अन्य शक्ति पीठ हैं। इसके अलावा बौद्ध धर्म के एक केंद्र के रूप में धर्मशाला है। हिमाचल में भी आध्यात्मिक रूप से अपनी पर्वतीय संरचना के कारण योग और आध्यात्म की पर्याप्त संभावना है।
आध्यात्मिक पर्यटन
- इंटरनेशनल जर्नल ऑफ साइंस एंड रिसर्च में छपे के एक शोध के मुताबिक आयुर्वेद से लेकर योग और संतुलित मन स्थिति की चाह आज के समय में भारत के आध्यात्मिक पर्यटन के रुप में उभर कर सामने आया है। पश्चिम और महानगरों के निवासियों में यह चलन बढ़ता जा रहा है। योग के साथ ही ध्यान के पश्चिम और देश के महानगरों में भी कई केंद्र स्थापित हो गए हैं। कई संस्थाएं हैं जो इस काम को कर रही हैं। इनमें शामिल होने वालों की संख्या बढ़ रही है। इसके लिए ये दूर-दूर तक की यात्रा करने से नहीं घबराते और यही यात्रा आध्यात्मिक पर्यटन को जन्म दे रही है।
कश्मीर...
उत्तराखंड और हिमाचल में भी आध्यात्मिक पर्यटन की पर्याप्त संभावना है। वैष्णो देवी और अमरनाथ गुफा, चरार ए शरीफ के साथ ही रघुनाथ मंदिर, खीर भवानी मंदिर के अलावा लद्दाख में बौद्ध धर्म की उपस्थिति, हिमालय का विस्तार इस क्षेत्र को आध्यात्म के लिए उर्वर भूमि बनाता है। अज्ञेय की शेखर एक जीवनी का नायक कश्मीर में पहुंचकर ही अपने अंतर की ऊर्जा को महसूस करता है। हिमालय और नदियों की प्रचुरता भी इस क्षेत्र को आध्यात्मिक पर्यटन के लिहाज से मजबूत बनाती है।
स्वामी सुंदरानंद
-उत्तरकाशी (उत्तराखंड) में स्वामी सुंदरानंद को फोटो वाले बाबा के नाम से जाना जाता है। दक्षिण में जन्मे स्वामी सुंदरानंद ने गंगोत्री को अपनी कर्मस्थली बनाया और एक कैमरे की सहायता से हिमालय की विभिन्न छवियों को डेढ़ लाख से अधिक फोटो में कैद किया।
योग और वेदांत सिखाता है प्रकृति प्रेम: स्वामी कशिकानंद
आध्यात्मिक पर्यटन की यात्रा को उत्तरकाशी में रह रहे स्वामी कशिकानंद को देखकर समझा जा सकता है। स्वामी कशिकानंद को 1997 में योग की जानकारी मिली और स्वामी चैतन्यनंद के संपर्क में आने पर इजरायल छोड़कर उत्तरकाशी पहुंच गए। स्वामी कशिकानंद के मुताबिक वे संन्यास ले चुके हैं और वेद, संस्कृत, वेदांत, योग के अभ्यास में लीन हैं। स्वामी कशिकानंद के मुताबिक यह समझ में नहीं आता कि एक तरफ गंगा की पूजा होती है और दूसरी तरफ गंगा में गंदगी समाहित की जाती है। योग और वेदांत दोनों ने ही प्रकृति प्रेम सिखाया है। हिमालय की यही प्राकृतिक सुंदरता उसे योग और वेदांत से जोड़ देती है।