17 मार्च 1992 को तत्कालीन योजना आयोग में डॉ. जेएस कासिम की अध्यक्षता में एक विशेष दल गठित हुआ था। इस दल ने हिमालयी राज्यों का अध्ययन करने के बाद सिफारिश की कि अति संवेदनशील होने के कारण यहां एक हिमालय विकास प्राधिकरण बनना चाहिए। दल ने हिमालयी राज्यों के अलग मंत्रालय के गठन बनाए जाने के विकल्प पर भी विचार करने की सलाह दी।
हिमालय सिर्फ बर्फ की चोटियां नहीं
पर्यावरणविदें, प्रेमियों व समाजसेवियों का मानना है कि हिमालय की चिंता सिर्फ बर्फ से लकदक चोटियां, हिमनद और सदानीरा नदियां ही नहीं है। दरअसल, हिमालय की संपूर्णता उस समाज, संस्कृति और परंपराओं से है, जो यहां बड़ी आबादी के तौर पर वास करती है। उसका सबसे पहला प्रहरी और चिंतक यहां बसने वाला समाज भी है। उसकी चिंता किए बगैर हिमालय की चिंता बेमानी है।
इसलिए चाहिए मंत्रालय या प्राधिकरण
पिछड़े क्षेत्रों की पहचान कराना। उनका संपूर्ण संरक्षण एवं समग्र विकास करना। विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए वित्तीय पैकेज उपलब्ध कराना। सीमा पार से हो रही घुसपैठ को नियंत्रित करने के प्रभावी उपाय करना।पर्यावरण और पारिस्थितिकी से संतुलन बैठाते हुए अवस्थापना विकास करना। विकास परियोजनाओं के लिए संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों को अनुशंसा करना। हिमालयी संपदा आधारित उद्योगों की स्थापना करना और पलायन रोकना।
तथ्यों की नजर में हिमालय
हिमालय क्षेत्र में 11 राज्य हैं, जिनमें उत्तराखंड, हिमाचल, असम, जम्मू कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा हैं।
- इनका पूरा क्षेत्रफ ल 5 लाख 93 हजार वर्ग किमी है
- 2011 की जनगणना के अनुसार, इसकी 7 करोड़ 51 लाख 58 हजार आबादी है
- 52 जिलों का वाले हिमालय के 40 लोकसभा सदस्य हैं
- सालाना 10 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी एशिया महाद्वीप को देता है
- उत्तर भारत की नदियों में सालाना 650 घन मीटर पानी हिमालय से आता है
- देश की 50 प्रतिशत आबादी की प्यास बुझाता है
- भारत में हिमालय का 2500 किमी का क्षेत्र है, जो 400 किमी तक फैला है