यह हिमालय ही है जिसे वाटर टावर के रूप में जाना जाता है। इंडियन हिमालयन रीजन या आईएचआर में ही 38 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले 5000 से ज्यादा ग्लेश्यिर हैं। यहां 10 हजार से ज्यादा पुष्प प्रजातियां हैं। नदियों, झीलों, ताल, तलैया, बुग्यालों के घर हिमालय में 240 से ज्यादा स्तनपायी प्रजातियां, 750 से ज्यादा पक्षी रहते हैं। यहां से निकलने वाली सदानीरा नदियों पर लाखों लोगों का जीवन निर्भर है।
...सिर्फ हिमालयी राज्यों तक सीमित नहीं रह सकती यह मुहिम
हिमालय के संरक्षण की कोई भी मुहिम सिर्फ हिमालयी राज्यों तक ही सीमित नहीं रह सकती। 2006 में योजना आयोग ने भी इस बात को महसूस किया था। योजना आयोग ने पंच वर्षीय योजना के तहत माउटेंन टास्क फोर्स का गठन किया था और इसके चेयरमैन उत्तराखंड के मुख्य सचिव रह चुके डॉ.आरएस टोलिया को बनाया गया था। आयोग की इस रिपोर्ट में भी हिमालय क्षेत्र के लिए व्यापक रूप से काम करने की सिफारिश की गई थी।
हिमालय की मिट्टी, पानी, हवा सब देश का है, लेकिन हिमालय को बचाने की जिम्मेदारी जैसे पर्वतीय राज्यों पर ही आ पड़ी है। हिमालयी राज्य जब हिमालय को बचाने की गुहार करते हैं तो ऐसा लगता है कि ये राज्य अपनी क्षेत्रीय अस्मिता, पहचान, अस्तित्व को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जंगल इन पर बोझ हैं और ग्रीन बोनस की मांग इस बोझ को उठा न पाने की मजबूरी से उपजी है। ग्रीन बोनस अगर मिल गया तो इन्हीं राज्यों को फायदा होगा। पर्यावरण में सुधार हुआ तो इन्हीं राज्यों को इसका फायदा मिलेगा। एक खास अर्थ में यह दृष्टिकोण दिल्ली में नार्ड डिवाइड को भी जन्म देता है।
यह भुला दिया जाता है कि हिमालय से निकलने वाली नदियां मैदानों को सिर्फ पानी नहीं देतीं। ये अपने साथ उर्वर मिट्टी भी लाती हैं। गंगा-यमुना का जल संग्रहण क्षेत्र इसका उदाहरण है। पहाड़ की ये नदियां बिजली भी देती हैं। जंगल कार्बन सिंक का काम करते हैं और हिमालय अपनी संपूर्णता में मानसून को नियंत्रित करता है।
हिमालय दिवस की इस बार की एक थीम यह भी है। हिमालय के सरोकार क्षेत्रीय नहीं राष्ट्रीय हैं। चीन सीमा और नेपाल सीमा के हाल के विवाद में इसे अच्छी तरह से महसूस किया जा सकता है। ठीक इसी तरह से हिमालय के लिए उपभोक्तावादी नजरिया नहीं चलेगा। हिमालय में प्रकृति अपनी मूल अवस्था में मौजूद है। उसका सम्मान सभी को करना होगा। सीमा पर विस्फोटकों को लाने वाले देशों को भी और बुग्याल की ओर रुख करने वाले पर्यटक को भी।
-पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी, संस्थापक निदेशक हेस्को