गंगा तट पर उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी की आंखों से गंगा-जमुना! अवसर था ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित असमी लेखिका इंदिरा गोस्वामी के अस्थि विसर्जन का।
अजीज कुरैशी अपनी मित्र लेखिका के परिवार के ‘बड़े सदस्य’ की भूमिका निभाते हुए वीआईपी घाट पर हुए कार्यक्रम में न सिर्फ शामिल हुए बल्कि पंडितों को दान-दक्षिणा भी दी।
इस अवसर पर इंदिरा गोस्वामी के व्यक्तित्व और कृतित्व का उल्लेख करते हुए महामहिम जज्बाती हो गए। उस वक्त इंदिरा गोस्वामी की भतीजी, उनका परिवार और कई गण्यमान्य लोग भी मौजूद थे।
किया वादा निभाया
बृहस्पतिवार को अस्थिविर्जन कार्यक्रम में शामिल राज्यपाल ने कहा कि उनकी इंदिरा गोस्वामी से उनकी पारिवारिक मित्रता पिछले 55 सालों से थी।
दो साल पहले जब वह काफी बीमार थीं तो उनसे मिलने गए थे। इंदिरा गोस्वामी ने राज्यपाल से अपनी अंत्येष्टि अथवा अस्थि विसर्जन कार्यक्रम में शामिल होने का वादा लिया था।
इंदिरा गोस्वामी का जिक्र करते हुए राज्यपाल अपने आंसुओं को नहीं रोक सके और उनका गला रुंध गया। राज्यपाल ने सुबकते हुए बताया कि वह बहुत ही स्वाभिमानी और निडर समाज सेविका थीं। 2004 में उन्होंने राज्यसभा सदस्य बनने से इंकार किया, वहीं पद्मश्री लेने के लिए भी हामी नहीं भरी।
ऐसी शख्सियत कभी नहीं मरती
साहित्य के क्षेत्र में भारत ही नहीं मलयेशिया और इंडोनेशिया में भी उनका नाम आदर से लिया जाता है। राज्यपाल ने कहा ऐसी शख्सियत कभी नहीं मरती, वे लोगों के दिलों और जेहन में हमेशा जिंदा रहती हैं।
इंदिरा गोस्वामी परिवार के ‘बड़े सदस्य’ की हैसियत से राज्यपाल ने अस्थि विसर्जन क्र्रिया कराने वाले पंडितों को 1000 रुपये दक्षिणा दी।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. महावीर अग्रवाल ने अस्थि विसर्जन के बाद शांतिपाठ कराया। इस दौरान इंदिरा गोस्वामी की भतीजी के पति तीर्थराज शर्मा, जिलाधिकारी डा. निधि पांडे, एसएसपी राजीव स्वरूप, लोकसेवा आयोग की सदस्य डा. छाया शुक्ला, कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौजूद रहे।
‘बुआ तो बस लिखती रहती थी’
इंदिरा गोस्वामी की भतीजी मृणमयी ने बताया कि उनकी बुआ दिल्ली विश्वविद्यालय में साहित्य विभागाध्यक्ष रही। दिन-रात बस लिखती रहती थी।
बुआ ने रामायण शोध संस्थान की स्थापना की और बाद में अपना घर भी इसी संस्थान को दान कर दिया। नीदरलैंड से पुरस्कार में मिले 62 लाख रुपये भी इंदिरा ने अस्पताल बनाने में दान कर दिए थे।