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आखिर कहां से आए 200 साल पुराने कब्रनुमा चबूतरे!

Thu, 11 May 2017 01:44 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हल्द्वानी 
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गौला नदी से सटी आईएसबीटी की जमीन पर खुदाई में निकले कब्रनुमा चबूतरों की गुत्थी सुलझ नहीं रही है। कब्रों को सहेजने और सत्यता का पता लगाने में प्रशासन की रुचि नहीं है।
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मामला सामने आने के बाद भी न तो इतिहासकारों की टीम को बुलाई न ही अफसरों ने खुद निरीक्षण किया। इतिहासकार भी सटीक टिप्पणी करने से परहेज कर रहे हैं। 

आठ हेक्टेयर रिजर्व वन भूमि के इलाके में इंटर स्टेट बस टर्मिनल (आईएसबीटी) का काम हो रहा है। कार्यदायी संस्थान नागार्जुन ने जब वन भूमि को समतल करने के लिए खुदाई का काम किया तो वहां हडि््डयां निकलनी शुरू हो गईं। पहले तो इसे हल्के में लिया गया लेकिन मंगलवार को कब्रनुमा चबूतरे निकलने लगे। 

कब्रिस्तान होने के संदेह में खुदाई कर रहे मजदूर डर गए और सुपरवाइजर को इसकी सूचना दी। इसके बाद कार्यदायी संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर ने भी निरीक्षण किया और काम पर रोक लगा दी। बुधवार को बनभूलपुरा थाना पुलिस ने उस स्थान का मौका मुआयना किया जहां बच्चों की कब्रें ज्यादा मिली हैं। पुलिस को एक बच्चे की खोपड़ी की हड्डी भी पड़ी मिली। पुलिस ने इसका पंचनामा भरकर कब्जे में ले लिया है। बाद में कब्रों की रिपोर्ट आला अफसरों को दी। 
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... तो अहमद खान और साथियों की हैं कब्र

कब्रों से न हो कोई छेड़छाड़ 
हल्द्वानी। आरटीओ राजीव महरा और एआरटीओ गुरुदेव सिंह ने गौलापार आईएसबीटी का निरीक्षण करने के बाद कहा कि कार्यदायी संस्था को कब्रों से किसी भी किस्म की छेड़छाड़ और आसपास खुदाई नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। 

इतिहासकार की राय
पूर्व में यह समूचा इलाका छकाता परगना था जो नैनीताल से हल्द्वानी तक था। गौला नदी के किनारे जहां खुदाई में कब्रें मिली हैं वह महर थोकदार का इलाका था। यहां कब्रें मिलने पर दो मत हो सकते हैं। पहला जब 1857 में रुहेला सरदारों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो अंग्रेजों ने गोरखों के संग मिलकर उनका दमन कर दिया। उनकी लाशें दफना दी गई होंगी हालांकि बच्चों की कब्रें भी मिली हैं तो यह भी माना जा सकता है कि 1920 में महामारी फैली थी तब बच्चों को दफनाया गया होगा। कब्रों और हडि््डयों की सही उम्र का पता लगाने के लिए कार्बन डेटिंग की बजाय थर्मो लुमिनिसेंस विधि ज्यादा मुफीद है। 
- अजय रावत, इतिहासकार कुमाऊं विवि, नैनीताल

... तो अहमद खान और साथियों की हैं कब्र
पुराने जानकार निसार अहमद अंसारी का कहना है कि 1857 में आजादी के पहले संग्राम के दौरान मेरठ में जन्मे मोहम्मद अहमद खान ने अंग्रेजों के खिलाफ तलवार उठा ली। उन्होंने अंग्रेजों को हरा कर अल्मोड़ा तक फतह हासिल कर ली थी। करीब छह से सात माह तक शासन भी किया। बाद में अंग्रेजों ने गोरखों संग मिलकर अहमद खान और उनके साथियों की हत्या कर दी थी। इनको यहीं दफना दिया गया था। उन्होंने सीमेंट की कब्रों के बारे में कहा कि तीस साल पूर्व जंगल को घेरा गया था उसी दौरान वहां ऐसी कब्रें बना दी गई होंगी।  जल्द ही जंगलात ने कब्जा हटा दिया तो यह भी भूली बिसरी यादें हो गईं जो अब दुबारा खुदाई में मिली हैं।
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ये हैं अनसुलझे सवाल

ये हैं अनसुलझे सवाल
- अगर कब्रनुमा चबूतरे सौ-दो सौ साल पुराने हैं तो कब्रों पर सीमेंट कहां से आया जबकि सौ साल पहले सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होता था।
- आईएसबीटी से सटे स्टेडियम में एक भी कब्रनुमा चबूतरा क्यों नहीं मिला
- पानी के तेज बहाव और पत्थरों के टकराव के बाद भी आकृति में बदलाव क्यों नहीं आया, सभी नए लग रहे हैं।
-  छोटी कब्रों की संख्या अधिक क्यों है। कहीं ये महामारी मृत उन बच्चों के तो नहीं हैं जिन्हें दफनाया गया था।
  क्या कहते हैं अफसर
कब्रों की सूचना देहरादून मुख्यालय को दी जाएगी वहां से मिले निर्देशानुसार ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। 
- राजीव महरा, आरटीओ कुमाऊं, हल्द्वानी 
पुलिस ने आसपास रहने वालों से पूछताछ की है लेकिन किसी ने भी कब्रिस्तान होने से इंकार किया है। वहां हड््डी का सैंपल लिया गया है इसकी जांच कराई जाएगी। 
- यशवंत सिंह चौहान, एएसपी, नैनीताल
1930-32 से यह क्षेत्र रिजर्व फारेस्ट है इससे पहले वहां नदी बहती थी इस तरह की कोई जानकारी नहीं है। हो सकता है चित्रशिला घाट से बहकर हडि््डयां आई हों इस बारे में कुछ कहना मुश्किल होगा।
- डॉ. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त नैनीताल
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