साहब एक मोबाइल कंपनी में लोगों को कंपनी की स्कीम के बारे में जागरूक करने का कार्य करते हैं।
लोगों को बताते हैं कि वह फर्जी कॉल से कैसे बचें, किस तरह शिकायत करें, लेकिन जब खुद इस तरह की कॉल के जाल में फंसे तो समझ आया कि जागरूक होने का भाषण देना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल इस तरह के जालसाजों से बचना।
उनके पास हर सप्ताह कम-से-कम दो काल इस तरह के आ रहे हैं, लेकिन वह मोबाइल कंपनी में होने के बावजूद कॉल करने वालों का कुछ कर नहीं पा रहे। मोबाइल फोन स्विच ऑफ निकलता है और आईडी भरोसेमंद नहीं होती।
सब कुछ ‘अज्ञात’ में जा रहा है। आलम यह है कि अब साहब से इस तरह के कॉल से बचने का तरीका भी पूछो तो चिढ़ जाते हैं। कहते हैं- थाने जाओ, कंपनी में क्या करने आए हो?
यह बात दीगर है कि खुद चक्कर काटने से बचने के लिए उन्होंने खुद अभी तक थाने का रुख नहीं किया। ऐसे ही लोगों के लिए तो कहा गया है- पर उपदेश कुशल बहुतेरे....।