देहरादून में एक नामी संस्थान में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में विदेशी भी पहुंचे। समस्या यह हुई कि संस्थान के हिंदी अधिकारी को इन मेहमानों के स्वागत का जिम्मा दे दिया गया।
स्वागत करते यह महोदय बार-बार अंग्रेजी के बीच दो वाक्य हिंदी के टपका देते। मेहमान मुंह खोले बार-बार अन्य मौजूद लोगों से कहे गए का मतलब पूछते नजर आए।
संस्थान के उच्चाधिकारी ने हिंदी अधिकारी को अपने पास बुला उनके कान में मेहमान की इस परेशानी को डाला तो जनाब ने इन सभी से माफी तो मांगी, लेकिन वह भी अपनी हिंदी में।
बहरहाल, भाव समझ मेहमानों ने मुस्कराहट के साथ उनकी इस माफी पर मुहर तो लगाई, लेकिन वह बाद तक उनके बोले कई शब्दों का अर्थ उच्चाधिकारियों समेत अन्य लोगों से पूछते नजर आए।
आखिर एक उच्चाधिकारी से रहा नहीं गया। उन्होंने इंतजामिया कमेटी के अध्यक्ष को बुला उसे डांट पिला डाली। कहा कि हिंदी बढ़ाने का काम तो संस्थान में हो ही रहा है। विदेशी मेहमानों को हिंदी सिखाने का ठेका किसने दे दिया।
हिंदी अधिकारी महोदय रूष्ट हैं। इस रवैये को भी हिंदी की बड़ी बाधा मान देश के भविष्य को खतरा बताने से नहीं चूकते। उनसे सहमति जताते हैं, लेकिन उच्चाधिकारी के सामने तुरंत पलट जाते हैं। नौकरी जो करनी है...।