आत्मकथा में बापू लिखते हैं कि जिस रेलगाड़ी से वह हरिद्वार आ रहे थे, वहां हिंदू पानी और मुस्लिम पानी बेचने वाले अलग-अलग लोग आ रहे थे। मुसलमान हिंदू पानी नहीं पीते थे और हिंदू मुस्लिम पानी। हरिद्वार आकर बापू ने कुंभ की भारी भीड़ देखी। उन्होंने लिखा कि मेले में 17 लाख श्रद्धालु थे।
इसके विपरीत अस्थायी शौचालय बहुत कम और बेहद बुरी दुर्गंध से भरे हुए थे। तब बापू ने स्वयं झाड़ू उठाया और कुंभ क्षेत्र के शौचालय साफ किए। बापू ने देखा कि शूद्रों के गंगा स्नान के लिए अलग घाट बनाए गए थे।
स्वामी श्रद्धानंद से मिलने के बाद बापू के ज्ञानचक्षु खुल गए। कुंभ क्षेत्र में हरकी पैड़ी के पास बैठकर उन्होंने भारतवासियों की गरीबी, लेकिन कड़े आत्मबल का दर्शन अपनी आंखों से किया।