शिकारियों पर शिकंजा कसने और जंगल व वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग का नेटवर्क पूरी तरह फेल है। इंटेलीजेंस के नाम पर बजट और स्टाफ की कमी के साथ अफसरों की ढिलाई से जहां दुर्लभ वन्यजीवों की जान जोखिम में है, वहीं महकमा खाली हाथ पहरेदारी का ढिंढोरा पीट रहा है।
खुफिया तंत्र नाकाम
बाघ, गुलदार सहित अन्य वन्यजीवों की शिकार करने वाले शिकारियों की मुखबिरी करने में जंगलात महकमा पूरी तरह फेल है।
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कार्बेट टाइगर रिजर्व से लेकर वन प्रभागों तक में शिकार की घटनाएं हो रही है, लेकिन उसकी खुफिया जानकारी जुटा पाने में अफसर नाकाम है।
बाघ हैं निशाने पर
प्रदेश में खासतौर पर बाघों का ताबड़तोड़ शिकार किया जा रहा है, लेकिन महकमे के अफसरों से लेकर प्रदेश सरकार को इसकी चिंता नहीं है। हर कोई हाथ पर हाथ धरे हुए बैठा है।
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खुफिया सूचनाएं एकत्र करने के नाम पर सरकार ने वन विभाग में एंटी पोचिंग सेल का गठन तो किया और उसका हेड अपर प्रमुख वन संरक्षक स्तर के अफसर को बना दिया गया।
इस सेल में स्टाफ के नाम पर एक भी कर्मचारी की तैनाती नहीं की गई है। इतना ही नहीं खुफिया नेटवर्क के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती।
नहीं है आपस में सहयोग
कार्बेट टाइगर रिजर्व से लेकर अन्य वन प्रभागों में भारी भरकम वन सरक्षाकर्मी तैनात तो किए गए हैं लेकिन ये दस्ते भी महज अपनी बीट तक ही सीमित हैं। एकाध को छोड़कर फील्ड में तैनात प्रांतीय वन सेवा या भारतीय वन सेवा के अधिकारी खुफिया सूचनाएं एकत्र करने या मुखबिर विकसित करने में रुचि नहीं लेते।
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इस लचर व्यवस्था के चलते प्रदेश में वन्यजीवों को बचाने के लिए खुफिया नेटवर्क पूरी तरह फेल है। नतीजतन शिकारी अपने काम को अंजाम देकर निकल जाते हैं।
जंगल विभाग का मंत्री नहीं
जंगलात महकमे का कोई अपना मंत्री नहीं है। यह महकमा मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पास ही है। मुख्यमंत्री की व्यस्तता के कारण इस महकमे पर बहुत अधिक फोकस नहीं हो पाता।
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देखरेख ना होने की वजह से महकमे के अधिकारी भी मनमर्जी से काम करते हैं। इसी का नतीजा है कि जंगल से लेकर वन्यजीवों तक की सुरक्षा पर कोई खास ध्यान नहीं दिया जा रहा है।