लोक एवं जनजातीय संस्कृति को संरक्षित रखने में कलाकारों की अहम भूमिका है। इसलिए लोक कलाकारों का सम्मान कुछ खास अवसरों पर ही नहीं बल्कि सदैव होना चाहिए। साथ ही उनकी कलाकृतियों को अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में भी उपयोग में लाना चाहिए। इससे उन्हें आर्थिक लाभ मिल सके।
भारतीय लोक एवं जनजातीय कला महोत्सव के अवसर पर वक्ताओं ने लोक एवं जनजातीय कलाकारों के योगदान को सराहा। एमकेपी पीजी कॉलेज की ओर से संस्कार भारती उत्तराखंड, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय केंद्र जम्मू एवं कश्मीर के सहयोग से कला महोत्सव का आयोजन किया गया। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले सत्र में मुख्य अतिथि दून विवि की कुलपति प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि भारतीय लोक एवं जनजातीय कला में उत्सव धर्मिता रची बसी है। कहा कि आज जब हम स्वतंत्रता के 75 वर्ष का अमृत महोत्सव मना रहे है। ऐसे में लोक एवं जनजातीय कलाकारों को समर्पित यह महोत्सव बेहद खास है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक डॉ. वीरेंद्र ने कला केंद्र द्वारा लोक एवं जनजातीय कला के संरक्षण, संवर्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। मुख्य वक्ता प्रो. मंजुला चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय लोक कला में नयापन और ताजगी का संचार है। लोक कलाकार आज के परिप्रेक्ष्य में नए विचारों का समावेशन करने में सक्षम है। इस मौके पर डॉ. सूरत ठाकुर, डॉ. गगन गंभीर, डॉ. सुधा रानी पांडे आदि ने भी विचार रखे।