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दून का इतिहास बताता है अशोक का शिलालेख

Wed, 23 Oct 2013 04:49 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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दुनिया भर में अपनी महानता के लिए प्रसिद्घ सम्राट अशोक की एक नायाब निशानी उत्तराखंड में देहरादून जिले के कालसी में स्थित है। उत्तर भारत में केवल कालसी में ही सम्राट अशोक का शिलालेख है।
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सम्राट अशोक के प्रशासन के बारे में जानकारी
इस शिला का अपना ही महत्व है। इस शिला पर लिखे लेखों की भाषा प्राकृत और लिपी ब्राह्मी है। अनूठी प्रकृति के बीच स्थित यह शिला लेख सम्राट अशोक के आंतरिक प्रशासन के विषय में बताती है।

इसके साथ ही यह शिला सम्राट के दृष्टिकोण, प्रजा के साथ नैतिक, आध्यात्मिक एंव पिता जैसे संबंधों, अंहिसा के लिए उनकी प्रतिबद्घता और युद्व में सम्राट के त्याग के बारे में बताती है। इन कार्यों के लिए अशोक ने निषेधात्मक और प्रयोगात्मक नीतियां बनाई थी, यह भी इसी लेख से पता चलता है।
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अशोक की इन निषेधात्मक नीतियों में सांसारिक मनोविनोद, पशुबलि, अनावश्यक कार्यों में लिप्त होना, खुद का बखान करना तथा प्रयोगात्मक नीतियों में आत्म संयम, मन की शुद्घता, क़तज्ञत, माता-पिता की सेवा, ब्राहम्णों और सन्यासियों की सेवा व दान तथा धार्मिक विषयों पर आपसी सामंजस्य का उद्बोधन है।

धर्म घोष द्वारा विजय का उल्लेख
इस शिलालेख पर इन नीतियों को लागू करने के लिए सम्राट ने पशुओं को अनावश्यक मारने पर प्रतिबंध, जानवरों और इंसानों के लिए स्वास्थ्य सुविधा, युद्व घोष के स्थान पर धर्म घोष द्वारा विजय का उल्लेख किया गया है।

सम्राट अशोक ने न केवल अपने साम्राज्य और पडोस देश के अतिरिक्त दक्षिण और पश्चिमी देशों के समकालीन राजाओं जैसे सीरिया, इजिप्ट, मेसिडोनिया, सीरीन व इपिरस के साम्राज्य में भी इन उपदेशों का प्रचार किया।

कालसी में स्थित यह अभिलेख इस बात का प्रमाण देते हैं कि सम्राट अशोक द्वारा प्रतिपादित यह उपदेश केवल उपदेश नहीं रहे। इन्हें व्यवहार में भी उपयोग किया गया। जिस कारण सम्राट अशोक की गणना दुनिया के महान शासकों में की जाती है।
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