उत्तराखंड के मुख्यमंत्री आम चुनाव के नतीजों के बाद डैमेज कंट्रोल की रणनीति पर चलते हुए पदों को रेवड़ी की तरह बांट रहे हैं।
लेकिन पार्टी के पुराने और वफादर नेता हाशिए पर हैं। बीते चार दशक से राजनीति में सक्रिय पुराने कांग्रेसी विवेकानंद खंडूरी इन्हीं में एक हैं।
गोलीकांड में जख्मी होने के बावजूद चुप्पी साधी
हरक सिंह रावत के यमुना कालोनी स्थित आवास पर गोलीकांड में जख्मी होने के बावजूद चुप्पी साध पार्टी के प्रति अपनी वफादारी साबित करने वाले खंडूरी को मलाल है कि पुराने नेताओं की वरिष्ठता, ईमानदारी को दरकिनार कर दिया गया है।
खंडूरी को कुल मिलाकर गोली खाने के बाद भी ‘गोली’ ही मिली है। वह दम भरते हैं कि ऐसे वह अकेले नहीं बल्कि ऐसे और भी कई होंगे।
अमर उजाला से बात-चीत में 62 साल के खंडूरी याद करते हैं कि किस तरह वह तकरीबन चार दशक से लगातार कांग्रेस की सेवा करते आ रहे हैं।
छात्र जीवन में तीन बार डीएवी कॉलेज छात्र संघ के पदाधिकारी रहने के दौरान छात्र हितों की लड़ाई लड़ी। उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय रहे। एक सच्चे सिपाही की तरह हर वक्त पार्टी के साथ खड़े रहे।
शायद यही वजह थी कि गोलीकांड के बाद भी वह मुंह खोलने को तैयार नहीं हुए। बकौल खंडूरी मुंह खोलना पार्टी के लिए उचित न होता। लेकिन जैसी स्थिति है, उसमें एक अनुशासित वफादार कार्यकर्ता को मलाल होगा ही।