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उत्तराखंड के इस गांव में आपदा ने डाला डेरा

Wed, 18 Jun 2014 04:32 PM IST
रविंद्र थलवाल / अमर उजाला, उत्तरकाशी
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उत्तरकाशी में भटवाड़ी के गांव डिडसारी में आपदा मानों स्थायी डेरा जमा कर बैठ गई है।
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कभी भूकंप तो कभी बाढ़ की तबाही झेलने वाले इस गांव का आधा हिस्सा पिछले साल की बाढ़ में तबाह हो गया था।

इसके बाद बेघर प्रभावितों की मदद के नाम पर प्रशासन के साथ ही कई स्वयं सेवी संस्थाएं गांव तक पहुंचीं, लेकिन एक साल बाद भी प्रभावितों के जख्म जस के तस हैं।

सैलाब तो थम गया मगर मनेरी कालोनी में शरणार्थी बने दो दर्जन परिवारों की आंखों से आज भी सैलाब उमड़ पड़ता है। गांव में जिन परिवारों के मकान सुरक्षित बचे थे  वे भी खौफ के साये में जीने को मजबूर हैं।
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कुदरती आपदाओं से पुराना नाता

डिडसारी का कुदरती आपदाओं से पुराना नाता रहा है। प्रकृति ने इन्हें जो जख्म दिए हैं उन्हें वे कभी भूले नहीं भुला सकते। 1991 के भूकंप में यह गांव इस तरह कांपा कि पूरा गांव लगभग तबाह हो गया। गांव में 49 लोग जिंदा दफन हो गए थे।

कुछ साल बाद फिर से किसी तरह जीवन पटरी पर आया तो 17 जून 2013 को भागीरथी में आई प्रलयंकारी बाढ़ आधा को तबाह कर गई। गांव का झूलापुल भी बाढ़ के तेज उफान में बह गया था।

बेघर हुए चार दर्जन से अधिक परिवारों ने गांव के जूनियर और बेसिक स्कूल में शरण ली। कुछ माह बाद प्रशासन ने इन्हें जल विद्युत निगम की मनेरी कालोनी में शरण दी।

मदद के नाम पर केवल आश्वासन

एक साल में प्रभावितों की मदद के नाम पर प्रशासन के आला अफसरों के साथ कई स्वयं सेवी संस्थाएं गांव तक पहुंची।

टाटा ने तो गांव को गोद लेने की बात तक कही, लेकिन अभी तक एक भी परिवार को छत नसीब नहीं हुई। गांव के दो दर्जन परिवार आज भी शरणार्थी बने हुए हैं।

वह जब गांव पहुंचते हैं तो कड़वी यादें दिल में टीसने लगती हैं।

गांव के निर्वमान प्रधान विजय राणा, अनिल राणा, आपदा से बेघर बिंद्रा देवी, सरस्वती देवी बताती है कि टाटा द्वारा गांव को गोद लेने की कागजी कार्रवाई के चलते घर बनाने के लिए सरकारी मुआवजा भी नहीं मिल पा रहा है।
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पहाड़ जैसी चुनौतियां झेल रहे ग्रामीण

डिडसारी के न केवल दो दर्जन परिवार शरणार्थी बने हुए हैं, बल्कि जो परिवार गांव में भी रह रहे वह भी पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

बाढ़ में गांव का झूलापुल बहने के बाद ग्रामीणों ने कुछ माह तक तीन किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय कर पहाड़ी पगडंडी से आवागमन किया।

फिर नदी में पानी कम हुआ तो चंदा एकत्र कर लकड़ी का पुल बनाया, जो इस साल मई माह में नदी का जल स्तर बढ़ने पर बह गया।

अब फिर से ग्रामीण उसी पगडंडी से जान जोखिम में डालकर आवाजाही कर रहे हैं। स्कूली बच्चे भी इसी रास्ते आ-जा रहे हैं।
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