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इन आंखों में दिखाई देता है आपदा का दर्द और दहशत

Thu, 12 Dec 2013 10:31 AM IST
मनमीत रावत/ अमर उजाला, देहरादून
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चार दिन तक दस हजार लोगों को गांव के हर घर से राशन जमा कर खाना खिलाया गया। कोई अपने घर से कंबल लाया तो कोई कपड़े। जिसके घर में जो था, जो जितना सक्षम था उसने उससे बढ़ कर किया।
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‘थैंक्स’ बोलने के लिए फोन करते हैं
आज भी लोगों के फोन आते हैं। वे ‘थैंक्स’ बोलने के लिए फोन करते हैं और बोलते-बोलते भावुक हो जाते हैं। लेकिन गांव में किसी तरह से पहुंचे केदार घाटी से बच कर आए लोग तो वक्त के साथ घर पहुंच गए लेकिन गांव के लोग इसके बाद कई दिनों तक अभावों से जूझते रहे।

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किसी ने कोई मदद तक नहीं की। सरकारी मदद की बात तो सपने में भी नहीं आती। यह दर्द है उन गांवों से आए लोगों का जिन्होंने केदारघाटी में फंसे लोगों की दिल खोल कर मदद की। धाद के कार्यक्रम में धरियांज (जखौली ब्लॉक) गांव से सूरज आए थे तो डडोली गांव से मुन्नालाल।
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कार्यक्रम के मध्यांतर के दौरान दोनों से बातचीत हुई तो उन्होंने ऐसे किस्से सुनाए कि सुनकर आश्चर्य भी हुआ और गर्व भी। मुन्नालाल ने बताया आपदा के दो दिन बाद उनके गांव में चार हजार पर्यटक पहुंचे थे।

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इनमें से अधिकांश चल नहीं पा रहे थे, वे भूखे थे और सदमे में भी। गांव के ही लोगों ने इन लोगों की काउंसिलिंग की। गांव के सयाणे लोग जुटे और तय किया गया कि प्रत्येक घर से राशन आएगा। यह एतिहासिक घटना थी।

गांव में अन्न का एक दाना तक नहीं था
सबके घर से राशन आया। कुछ कंबल लेकर पंचायती घर की तरफ दौड़ रहे थे तो कोई चावल का कट्टा लेकर। सामूहिक भोज बना और सबको चार दिन तक खाना खिलाया गया। जब सभी पर्यटक चले गए तो गांव में अन्न का एक दाना तक नहीं था।

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फिर अगल-बगल के गांवों से राशन उपलब्ध हुआ। गौरीकुंड के सुनील गोस्वामी और डालसिंगी के चंदन ने बताया कि गांव में आए पर्यटकों के चेहरों पर खौफ देखकर हम भी भावुक हो जाते थे। उन्हें समझाया जाता कि अब वह सुरक्षित हैं।
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आज भी अधिकांश पर्यटकों के फोन आते और वह बात करते वक्त भावुक हो जाते हैं। वे कहते है कि पहाड़ की प्रलय भी देख ली और प्यार भी।
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