सरकार का एक मात्र ध्येय 19 विधेयकों को हर हाल में पारित कराना है। दूसरी ओर विपक्ष के मंसूबे बेशक घेराबंदी करने के हैं। सदन में वह मुद्दों को उठाने के अपने धर्म को निभाने में पीछे भी नहीं हटेगा। उसके करीब पांच सदस्य अपनी आवाज को बुलंद करने की कोशिश करेंगे। लेकिन संख्या बल में ज्यादा सत्ता पक्ष के शोर में उनकी आवाज असरदार रह पाएगी, इसमें संदेह है।
पिछले एक हफ्ते के दौरान जिस तेजी के साथ विधानसभा सत्र को लेकर बार बार बदलाव हुए हैं, उससे इसकी पारंपरिक खूबी खो सी गई है। तीन दिन का सत्र एक दिन में होने, स्थान तय न हो पाने, सदस्यों के वर्चुअल जुड़ने जैसे निर्णयों के बीच बेशक बुधवार को सत्र होगा। लेकिन वैसा नहीं जैसा आज तक होता आया है। विधानसभा में सत्र का आयोजन किसी उत्सव सरीखा ही होता रहा है।
पहली बार ऐसा लग रहा है कि सत्र कराना चूंकि जरूरी है, इसलिए ये मजबूरी का सत्र बन गया है। बाहरी तौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष बेशक सत्र में सक्रिय भागीदारी की बातें कर रहे हैं। लेकिन कोविड-19 महामारी से पैदा हुए विकट हालातों के बीच सत्र के आयोजन के प्रति सदस्यों में वैसा आकर्षण नहीं रहा है।
रही सही कसर सदस्यों के कोविड संक्रमण की चपेट में आ जाने से पूरी हो गई है। इससे न भाजपा अछूती है न कांग्रेस। ऐसे हालातों में सत्र केवल एक अनुष्ठान बन गया है, जिसमें सरकार और विपक्ष दोनों को आहुतियां डालनी है।