मैं करीब पांच या छह साल का था। तब किसी बात पर मुझे डांट पड़ी तो मैं नाराज होकर पिरूल के ढेर में छिप गया। काफी आवाजों के बाद भी मैं नहीं निकला। ननिहाल नजदीक था तो घर वालों ने सोचा कि मैं ननिहाल चला गया। वहां पूछने पर जब मेरा पता नहीं चला तो मेरी तलाश शुरू हुई। जहां मैं छिपा था वहीं पर एक बड़ी सी बिल्ली आकर बैठ गई। बिल्ली तो नहीं देख पाया लेकिन उसकी धारियां देखकर मैं उसे बाघ समझकर डर गया। ठीक उसी समय मेरी चाची गोठ में गाय-भैंसों को चारा देने आई तो मैं बोल पड़ा काकी मैं यहां छौं (चाची मैं यहां हूं)। चाची ने बाहर जाकर कहा कि हरीश तो यहां छिपा है। तब तक बिल्ली भाग गई और मैं पकड़ में आ गया। उस दिन मेरी बड़ी पिटाई हुई कि तुमने सबको परेशान कर दिया। बच्चों से यही कहूंगा बचपना ठीक है लेकिन अपने मां-पिता को परेशान न करें और अभिभावकों से कहूंगा कि बच्चों को उनका बचपन जीने दें।
-हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री
आम बच्चों की तरह ही था शरारती
मैं भी बचपन में आम बच्चों की तरह ही शरारती था। मेरे पिता बीएसएफ में थे। एक बार श्रीनगर में गढ़वाल राइफल के प्रोग्राम में ले गए तो वहां पर सेना का बैंड गीत बजा रहा था कि ‘बढ़े चलो गढ़वालियों बढ़े चलो दिल में जिगर आंख में काल चाहिए तलवार चाहिए ना कोई ढाल चाहिए गढ़वालियों के खून में उबाल चाहिए...। इस गीत को सुनकर साढ़े तीन साल की उम्र में भी सेना में जाने का जज्बा पैदा हो गया था। इस जज्बे को जुनून बनाने का काम किया स्कूल में सुने एक और गीत ने ‘जन्नत की है तस्वीर ये तस्वीर न देंगे। हाथों में किसी गैर के तकदीर न देंगे। कश्मीर है भारत का कश्मीर न देंगे।’ मेरा सौभाग्य है कि मुझे गढ़वाल राइफल को कमांड करने का मौका मिला और कश्मीर में तैनाती भी मिली। अभिभावकों को यही कहूंगा कि बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ ही देशप्रेम का जज्बा भी पैदा करें।
- कर्नल अजय कोठियाल, आप के मुख्यमंत्री पद के दावेदार
बचपन जीने दें
आज के दौर के अभिभावकों के साथ एक समस्या है कि वे अपने बच्चों को उनका बचपन जीने नहीं देते हैं। छोटे से कंधों पर उम्मीदों का भारी बोझ डाल देते हैं। जनप्रतिनिधियों का भी ऐसे अभिभावकों से यही कहना है कि अपने बच्चों को भी उनका बचपन जीने दें। उनके साथ वक्त बिताएं और उन्हें पढ़ाई के साथ ही मैदान में खेलने और कूदने भी दें।