किसी सरकार में कार्यों का अनुश्रवण यदि मुकम्मल नहीं है तो मुख्यमंत्री चाहें कितनी भी भाग दौड़ करें, योजनाएं धरातल पर नहीं उतरतीं।
यह बात इस समय राज्य के सरकारी सिस्टम पर एकदम फिट बैठती है। राज्य में ऐसे दो दर्जन महत्वपूर्ण काम हैं जो या तो सीएम के कहने के बावजूद फाइलों में नहीं उकेरे गए और या संबंधित फाइल कार्यवाही के लिए आगे नहीं खिसकी।
ऐसे प्रोजेक्ट जिनका ऐलान सीएम हरीश रावत ने अपने बजट भाषण जैसे वैधानिक दस्तावेज में किया था, उनमें से कुछ की फाइल शुरू नहीं हुई और कुछ की रफ्तार मंद है।
लापरवाही के उदाहरण पेश करते कुछ प्रस्ताव
दो साल पहले बने औद्यानिकी विपणन बोर्ड को 15 दिन पहले सीईओ मिला। विपणन का काम अभी तक शुरू नहीं, 15 रिक्त पदों में से किसी पर कोई भर्ती नहीं हुई।
करीब एक वर्ष पहले अनुसूचित जाति उपयोजना से भगवानपुर व पिथौरागढ़ में एक एक मेडिकल कालेज बनाया जाना तय हुआ, लेकिन अभी तक फाइल शुरू नहीं हुई।
एससी आबादी वाले क्षेत्रों मेंविभिन्न विकास कार्य करने के लिए एक साल पहले 25 करोड़ और अनुपूरक बजट में बढ़ाकर 50 करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया, लेकिन एक करोड़ रुपये भी जारी नहीं हो सके। अब अफसर कह रहे हैं कि पहले नियमावली बनेगी।
पर्वतीय चकबंदी के लिए हर ब्लॉक से एक-एक गांव का चयन होना था, लेकिन फाइल तक तैयार नहीं हुई।
आपदा के बाद जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग का 50 करोड़ से उच्चीकरण होना था, प्रदेश में 10 ट्रामा सेंटरों को पीपीपी मोड में संचालित करने की योजना थी, लेकिन फाइल दरबदर घूम रही है।
शिक्षा विभाग में पांच सौ स्कूलों का कंप्यूटरीकरण, मास्टरों की आनलाइन हाजिरी, पांच आवासीय विद्यालयों की योजनाएं दो वर्ष से शासन में विचाराधीन हैं।
बहुत कुछ खोया, पाया कुछ नहीं
पिछली यूपीए सरकार में केंद्र ने उत्तराखंड को पुष्प निदेशालय व अनुसंधान केंद्र दिया। इससे राज्य में फूलों की खेती को व्यापक स्तर पर लाभ व रोजगार मिलना था। लेकिन समय से जमीन नहीं मिलने के कारण यह महत्वपूर्ण केंद्रीय संस्थान महाराष्ट्र को दे दिया गया।
केंद्र ने करीब पांच साल पहले उत्तराखंड को एनआईआरडी (राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान) दिया। लेकिन जमीन नहीं मिली, करीब दो साल पहले यह संस्थान केंद्र ने जयपुर शिफ्ट कर दिया।