कैंसर पीड़ित मरीजों और तीमारदारों को खबर राहत देने वाली कतई नहीं हो सकती है। कैंसर पीड़ित मरीजों को हर्रावाला में निर्माणाधीन 300 बेड के अत्याधुनिक कैंसर अस्पताल में इलाज कराने के लिए फिलहाल एक साल का लंबा इंतजार करना होगा, क्योंकि अस्पताल का निर्माण कर रही निर्माणदायी एजेंसी ने सरकार और स्वास्थ्य विभाग से अस्पताल को पूरा करने के लिए एक साल का समय मांगा है।
हालांकि, अभी स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया गया। सीएमओ डॉ. मनोज उप्रेती ने बताया कि इस संबंध में आला अधिकारियों को अवगत कराया जा रहा है। साल 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की पहल पर अत्याधुनिक चिकित्सकीय सुविधाओं से लैस 300 बेड के कैंसर अस्पताल बनाने का निर्णय लिया गया था। पहले अस्पताल को राजधानी में बनाया जाना था, लेकिन जमीन के अभाव में कैंसर अस्पताल को हर्रावाला में बनाने का निर्णय लिया गया। हर्रावाला में जीवन ज्योति कैंसर अस्पताल ट्रस्ट की ओर से कैंसर अस्पताल बनाने के लिए उपहार स्वरूप जमीन भी मुहैया करा दी गई।
ऐसे में हर्रावाला में कैसर अस्पताल बनाने का रास्ता साफ हो गया। इतना ही नहीं साल 2020 में अस्पताल बनाने को लेकर 10 करोड़ की धनराशि जारी कर दी गई। कैंसर अस्पताल के निर्माण का डीपीआर तैयार करने के साथ ही 106.84 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया गया, जिसमें से 97 करोड़ रुपये केेंद्र सरकार और बाकी बजट राज्य सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाना है। निर्माण एजेंसी को इस बात की हिदायत दी गई कि वह किसी भी सूरत में मई 2022 में कैंसर अस्पताल का निर्माण पूरा करने के साथ ही स्वास्थ्य विभाग को सौंप दें, लेकिन फिलहाल निर्माण एजेंसी ने निर्धारित अस्पताल बनाने को लेकर हाथ खड़े कर दिए हैं।
निर्माणदायी एजेंसी ने फिलहाल अस्पताल का निर्माण कार्य पूरा करने के लिए एक साल का समय मांगा है। इस बाबत कोई निर्णय नहीं लिया गया है। पूरे प्रकरण से बड़े अफसरों को भी अवगत कराया जा रहा है। सरकार और स्वास्थ्य महानिदेशालय स्तर से ही कोई निर्णय लिया जाएगा।
- डॉ. मनोज उप्रेती, सीएमओ
फिलहाल श्रीमहंत इंदिरेश, जौलीग्रांट व मैक्स में सुविधा
राज्य सरकार की ओर से संचालित सरकारी अस्पतालों में कैंसर पीड़ित मरीजों की जांच और इलाज की उच्चस्तरीय सुविधा नहीं होने से सभी मरीजों को श्रीमहंत इंदिरेश अस्पताल, हिमालयन इंस्टीट्यूट अस्पताल जौलीग्रांट या फिर मैक्स अस्पताल जैसे बड़े अस्पतालों में जाकर इलाज कराना पड़ रहा है। जो मरीजों की जेब पर भारी पड़ रहा है। कई मरीज ऐसे हैं, जिनके पास इतना पैसा नहीं कि वे बड़े अस्पतालों में जाकर जानलेवा कैंसर बीमारी का इलाज करा सके।