दवा कारोबारी पियूष मौर्या ने रक्तदान-महादान को अपनी जिंदगी का फलसफा बना लिया है।
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यह सोचकर उनका खून किसी मजबूर मरीज को जिंदगी देने का सबब बनता है, वह खुश हो जाते हैं। पियूष कहते हैं कि तीन महीने पूरे होने पर वह रक्तदान करते हैं।
अमर उजाला फाउंडेशन ब्लड डोनर्स क्लब के सदस्य बने पियूष मौर्या ने 19 साल की उम्र में पहली बार रक्तदान किया था। उस वक्त वह साईं कॉलेज में पढ़ रहे थे।
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स्वैच्छिक रक्तदान शिविर लगा था तो उन्हें ब्लड देने का मौका मिला। उसके बाद रक्तदान-महादान को उन्होंने अपनी जिंदगी का फलसफा बना लिया।
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आईएमए ब्लड बैंक ऑफ उत्तराखंड ने उन्हें कई बार ट्रॉफी और प्रमाण पत्र भी दिए हैं। उन्हें आदर्श रक्तदाता का खिताब भी मिला। अमर उजाला फाउंडेशन ब्लड डोनर्स क्लब से जुड़कर खुश हैं कि उन्हें जरूरतमंदों को रक्तदान करने का मौका मिलता रहेगा।
इसके पहले अमर उजाला फाउंडेशन और आईएमए ब्लड बैंक के बैनर तले लगने वाले स्वैच्छिक रक्तदान शिविर में भी वह ब्लड दे चुके हैं।
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पियूष का मानना है कि खून बाजार में नहीं मिलता। इसे कोई कंपनी नहीं बना सकती। यह कुदरत का दिया तोहफा है। अगर उनके खून से किसी की जान बचती है तो इससे बड़ा और क्या कार्य हो सकता है। इसके साथ ही वे दूसरों को भी रक्तदान की प्रेरणा देते हैं।