बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा संपन्न होने के बाद अब पंडा पुरोहित शीतकाल में छह माह तक यजमानों के घरों में रिद्धि-सिद्धि की पूजा करने मैदानी क्षेत्रों को चले जाते हैं।
बदरीनाथ धाम में प्रतिवर्ष यात्रा शुरू होते ही देवप्रयाग से करीब 25 सौ पंडे-पुरोहित पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। कई पंडे अपने उन यजमानों को बदरीनाथ का प्रसाद लेकर जाते हैं जो किन्हीं कारणवश धाम नहीं पहुंच पाए हों। बदरीनाथ धाम में देवप्रयाग के पंडों की यजमानी है।
एक हजार वर्ष पुराना है पंडों का इतिहास
बदरीनाथ धाम में ब्राह्मण को पंडा नाम दिया गया है। धाम में पंडों का इतिहास एक हजार वर्ष पूर्व से है। आदिगुरु शंकराचार्य जब 8 वीं शताब्दी में बदरीकाश्रम क्षेत्र की ओर आए तो देवप्रयाग में दक्षिण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से अनेक गोत्र के ब्राह्मण भी पहुंचे। ये तेत्रीय शाखा के कृष्ण यजुर्वेदी ब्राह्मण थे।
जब हरिद्वार से बदरीनाथ धाम तक पैदल यात्रा होती थी तब तीर्थ पुरोहित ही यात्रियों को धाम तक ले जाते थे। तब यात्री अपने पुरोहितों को अपने घर में भी पूजा-अर्चना कराने का न्योता देते थे। पुरोहितों और तीर्थयात्रियों के बीच धार्मिक संबंधों की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। - दिनकर बाबुलकर, पूर्व सदस्य, बीकेटीसी, बदरीनाथ