सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर एक पोती ने दादा की अंतिम इच्छा पूरी की है। देहरादून के चमन विहार निवासी आढ़ती सुरेंद्र कुमार का अंतिम संस्कार उनकी पोती आस्था ने किया।
दादा बार-बार यही कहते थे कि निधन के बाद उनकी सभी क्रियाएं मेरी मोटी (आस्था) ही पूरी करे। परिजनों ने भी उनकी इच्छा का सम्मान कर आस्था को यह जिम्मेदारी निभाने में मदद की।
चमन विहार निवासी आढ़ती सुरेंद्र कुमार काफी समय से बीमार थे। उनकी पोती आस्था दिल्ली में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा है। 15 दिन पूर्व सुरेंद्र की तबीयत अचानक बिगड़ गई। जानकारी मिलते ही आस्था दून लौट आईं। दादा को अस्पताल में भर्ती कराया और उनकी देखभाल में जुट गई।
'मरने के बाद तू ही अंतिम संस्कार करना'
आस्था बताती हैं कि अस्पताल में दादा एक पल भी उसे नजरों से ओझल नहीं होने देते थे। बार-बार कहते, ‘मोटी, तू ही मेरा बेटा है। मेरे मरने के बाद तू ही अंतिम संस्कार करना।’ आस्था ने बताया कि जब वह आठ वर्ष की थी, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद दादा ने उन्हें ही बेटा माना।
आंखों में आंसू लिए आस्था बताती हैं कि दादा जब भी अंतिम संस्कार की बात कहते, वह हामी तो भरती लेकिन यह दिलासा भी देती कि दादा, अभी आपको और जीना है। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। किडनी फेल हो जाने से सोमवार को सुरेंद्र कुमार का निधन हो गया। आस्था कहती हैं कि उनका बेस्ट फ्रेंड चला गया है।
आस्था दादा के भाई राजा नागलिया, संजय, नीरज और परिजनों संग श्मशान घाट पहुंची और कपाल क्रिया संग सभी रीतियां निभाकर अंतिम संस्कार किया। राजा नागलिया ने बताया कि परिवार में तीन बेटे हैं, लेकिन बड़े भाई ने जो अंतिम इच्छा जताई थी उसका सम्मान कर परिवार ने आस्था के हाथों ही अंतिम संस्कार कराया।
वह कहते हैं बेटियां ऐसा करती हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं। उधर, श्मशान घाट पहुंचे हरिकृष्ण भट्ट ने कहा कि लालाजी अक्सर दुकान पर भी कहा करते थे कि मैं अपनी पोती से ही अंतिम संस्कार कराऊंगा।
..और पूजा बनी बेटा
ईदगाह के समीप प्रकाशलोक में रहने वाली 26 वर्षीय पूजा भी सोमवार को श्मशान घाट पहुंची थी। उसके पिता बनवारी यादव का निधन हो गया था और पूजा को ही अंतिम संस्कार करना था।
पूजा की मां पहले ही गुजर चुकी थीं। अब परिवार में पूजा और छोटी बहन आरती रह गए हैं। मंगलवार को पूजा और आरती पिता की अस्थियां चुनने दोबारा श्मशान घाट जाएंगी। इसके बाद वे हरिद्वार में अस्थियां प्रवाहित करेंगी।
बेटियां आज किसी क्षेत्र में कम नहीं हैं। सामाजिक मान्यताओं में भी काफी बदलाव आया है। अब बेटा-बेटी में फर्क करने वाले लोग कम ही दिखते हैं। बेटियां बेटों की ही तरह पाली जाती हैं तो बेटे के लिए बने नियमों का उनके द्वारा पालन करने में क्या बुराई है? इससे उन लोगों को भी प्रेरणा मिलती है, जिनके बेटे नहीं हैं।
- पं. अनिल शर्मा (आस्था के दादा और पूजा के पिता का अंतिम संस्कार कराने वाले)