उत्तराखंड के नैनीताल स्थित ओखलकांडा में 3.6 मीटर व्यास की एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन एक्टीवेट कर दी गई है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में मौजूद पीएम मोदी ने रिमोट से बटन दबाकर दूरबीन को एक्टीवेट किया।
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केंद्रीय साइंस एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने कहा है कि एशिया की सबसे बड़ी टेलीस्कोप का देश को समर्पित होना पूरे देश के लिए गौरवशाली क्षण है। उन्होंने कहा कि 3.6 मीटर व्यास वाली दूरबीन की स्थापना के बाद भारत सरकार दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास वाली दूरबीन की स्थापना की दिशा में काम कर रही है और इस दूरबीन को वर्ष 2023 तक स्थापित कर लिया जाएगा।
बुधवार को देवस्थल में एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास वाले टेलीस्कोप के रिमोट टेक्निकल एक्टीवेशन कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए उन्होंने यह बात कही। इससे पूर्व डॉ. हर्षवर्द्धन ने कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्जवलित कर किया।
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इंटरनेट के चलते दोनों देश के पीएम को करना पड़ा इंतजार
डॉ. हर्षवर्धन ने दीप प्रज्जवलित कर रिमोट टेक्निकल प्रोग्राम का शुभारंभ किया।
- फोटो : AmarUjala
ब्रसेल्स में मौजूद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बेल्जियम के प्रधानमंत्री चार्ल्स मेशेल को एशिया की इस सबसे बड़ी दूरबीन को बुधवार शाम 6:45 बजे बटन दबाकर एक्टीवेट करना था, लेकिन एन वक्त पर इंटरनेट कनेक्टीविटी में खराबी के चलते दोनों प्रधानमंत्रियों को करीब सवा घंटे तक इंतजार करना पड़ा।
करीब सात बजे कनेक्टिविटी सही मिलने पर प्रधानमंत्री मोदी ने बटन दबाकर इस दूरबीन को एक्टीवेट किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेल्जियम और भारत दोनों देशों के खगोल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी।
उन्होंने कहा कि इस परियोजना को सफल बनाने में दोनों देशों की सरकारों के साथ साथ बेल्जियम की एमौस कंपनी का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने एमोस कंपनी के सीईओ को भारत आने का भी न्यौता दिया।
2023 तक 30 मीटर व्यास की दूरबीन बनाएगा भारत
डॉ. हर्षवर्धन
- फोटो : AmarUjala
डॉ. हर्षवर्द्धन ने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि विज्ञान के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण यह टेलीस्कोप उत्तराखंड के ओखलकांडा जैसे दूरस्थ गांव में स्थापित की गई है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अमेरिका, कनाडा और जापान के साथ मिलकर दुनिया की सबसे बड़ी 30 मीटर व्यास वाली दूरबीन की स्थापना की दिशा में काम कर रही है जो कि 2023 तक संभवत: लद्दाख क्षेत्र में स्थापित करा दी जाएगी। इस परियोजना में भारत 1300 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है।
डॉ. हर्षवर्द्धन ने कहा कि 30 मीटर व्यास की दूरबीन की इस परियोजना में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर भारत में ही बनाए जा रहे हैं जो हमारी वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि देवस्थल में स्थापित दूरबीन पूरे देश के खगोल वैज्ञानिकों के लिए मील का पत्थर साबित होगी।
दूरबीन की तस्वीर नीचे अगली स्लाइड में देख सकते हैं।
यह है एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन।
- फोटो : कुलदीप कुमार/अमर उजाला
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं और निश्चित ही वह अपने इस मिशन में कामयाब होंगे।
इससे पूर्व एरीज के निदेशक डॉ. वहाबउद्दीन ने 3.6 मीटर व्यास वाली दूरबीन के बारे में जानकारी दी। कार्यक्रम को वैज्ञानिक पीसी अग्रवाल, डॉ. पृथ्वीराज और कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. होशियार सिंह धामी ने भी संबोधित किया।
इस दौरान देवस्थल परियोजना के परियोजना प्रबंधक डॉ. ब्रजेश कुमार, डॉ. मनीष नाजा, डॉ. महेंद्र सिंह, डॉ. उमेश दुम्का, डॉ. नरेंद्र सिंह, डॉ. आलोक गुप्ता, डॉ. रविंद्र सिंह, डॉ. चंद्रप्रकाश, डॉ. आशीष कुमार, डॉ. भरत सिंह रावत, डॉ. स्नेहलता समेत अन्य वैज्ञानिक, शोधार्थी और स्थानीय लोग मौजूद थे।