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सुहाग का सेना प्रमुख बनने में ऑपरेशन पवन का अहम रोल

Sat, 02 Aug 2014 02:32 PM IST
अरुणेश पठानिया/अमर उजाला, देहरादून
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सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग के सर्वोच्च रैंक पर पहुंचने के सफर में श्रीलंका में चला ऑपरेशन पवन बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जाता है।
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जनरल ने अपने कैरियर का यह बड़ा फैसला भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में बतौर इंस्ट्र्क्टर तैनाती के दौरान लिया था।

आईएमए इंस्ट्रक्टर सुहाग को जब यह पता चला कि उनकी बटालियन जाफना पहुंचते ही दुश्मन के बड़े हमले में कमांडिंग अफसर सहित कई अफसर और जवानों को खो चुकी है उन्होंने तुरंत प्रतिनियुक्ति समाप्त करवा मोर्चे पर वापसी की।

अकादमी इंस्ट्र्क्टर के सुरक्षित माहौल के बदले सुहाग ने श्रीलंका के जोखिम और चुनौती भरे माहौल को चुना।

हैरान करने वाला फैसला

उस समय मेजर सुहाग का यह फैसला हैरान करने वाला था, लेकिन आगे चलकर यह मील का पत्थर साबित हुआ।

1987 में मेजर सुहाग को उनकी काबलियत के बूते आईएमए देहरादून में जेंटलमेंट कैडेट को प्रशिक्षित करने के लिए बतौर इंस्ट्रक्टर तैनात किया गया।

आईएमए में बतौर इंस्ट्र्क्टर वह आराम से सैन्य ऑपरेशन में मिलने वाली चुनौतियों से दूर रह सकते थे, लेकिन इस बीच उनकी रेजिमेंट 4/5 गोरखा श्रीलंका शांति सेना का हिस्सा बनकर जाफना रवाना हो गई।

सुहाग उसका हिस्सा बनना चाहते थे, लेकिन सैन्य नियमों के तहत उन्हें प्रतिनियुक्ति पूरी करनी थी।

बटालियन के साथ मोर्चे पर लड़े

बटालियन के जाफना पहुंचने के दूसरे दिन ही सुहाग के पास आईएमए में सूचना आई कि उनके कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल इंदर बाल सिंह बाबा सहित कुछ अन्य अफसर और सैनिक जाफना में दुश्मन के हमले में शहीद हो गए।

जनरल सुहाग के लिए यह पल बेहद मुश्किल थे, जिस रेजिमेंट में उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया उनके सीओ, अफसर और जवान मारे गए।

सुहाग के लिए अगली चुनौती यह थी कि शहीद कर्नल बाबा का परिवार उस समय देहरादून में था।

मेजर सुहाग को जिम्मा दिया कि कर्नल बाबा के माता पिता को इसकी सूचना दें। सुहाग अपने कमांडिंग अफसर के परिवार को जब यह दुखद सूचना देने के बाद लौटे तो उन्होंने फैसला कर लिया कि वह अपनी बटालियन के साथ मोर्चे पर लडेंगे।
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कंपनी कमांडर बनाया गया

आईएमए कमांडेंट को अपने फैसले से अवगत करवा कि वह इंस्ट्र्क्टर तैनाती छोड़कर श्रीलंका जाना चाहते हैं। उच्च अधिकारियों ने सुहाग के फैसले के पीछे छिपे जज्बे को देखते हुए आवेदन के 24 घंटे में उन्हें श्रीलंका में रेजिमेंट ज्वाइन करने की अनुमति दे दी।

रेजिमेंट में वापस लौटने पर मेजर सुहाग को कंपनी कमांडर बनाया गया। आईएमए की तैनाती छोड़कर मोर्चे पर डटी बटालियन में मेजर सुहाग की वापसी ने जवानों और सहयोगी अफसरों का जज्बा दोगुना कर दिया।

मेजर सुहाग ऑपरेशन पूरा होने के दो बरस तक बटालियन के साथ श्रीलंका में कई सैन्य ऑपरेशनों का हिस्सा बने। जनरल सुहाग के सैन्य जीवन का यह सबसे अहम फैसला माना जाता है जिससे उनकी अपने सैनिकों के साथ जुड़ाव और गहरा हुआ।

इसी जुड़ाव के चलते जनरल सुहाग को 5 गोरखा के पहले कर्नल आफ द रेजिमेंट बने उसके बाद 1 जनवरी 2014 को प्रेजिडेंट गोरखा ब्रिगेड बन गए।
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