जिस अमेरिकी झाड़ी लैंटाना को इको सिस्टम के लिए खतरा बताया जा रहा है, वह रोजगार का बेहतरीन साधन है।
अगर युवाओं को लैंटाना के कारोबार से जोड़ा जाए तो गांवों से पलायन रुकेगा। लोग घर बैठे लाखों कमा सकते हैं। भारतीय वन अनुसंधान संस्थान ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे लैंटाना के फैलने का खतरा भी घटेगा और रोजगार मिलेगा।
लैंटाना प्लाई के फर्नीचर खूबसूरत होने के साथ मजबूत भी होते हैं। इससे डाई और वार्निश भी बनाई जा रही है। लैंटाना का कारोबार करने के लिए प्रदेश के अलावा यूपी, हिमाचल प्रदेश के लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रदेश के करीब 40 फीसदी वन क्षेत्र और नेशनल पार्कों में लैंटाना की जड़ें जमी हैं। कहा जाता है कि लैंटाना की वजह से वनस्पतियां उग नहीं पातीं। एफआरआई ने ऐसा उपकरण तैयार किया है जिससे लैंटाना को जड़ से उखाड़ा जा सकता है जिससे यह फैल नहीं पाएगी।
अहम बात यह है कि संस्थान ने लैंटाना की टहनियों से मजबूत प्लाई बनाने की भी तकनीक तैयार की है। इससे फर्नीचर बनाए जा सकते हैं। लैंटाना की टहनियों से डलिया, फूलों का गमला, हैंडीक्राफ्ट्स के आइटम बन जाते हैं। संस्थान के रसायन विभाग ने इसकी पत्तियों से डाई बनाने की भी तकनीक विकसित कर ली।
डाई बनाने के बाद पत्तियों का जो अंश बनेगा उससे कंपोस्ट खाद बन जाती है। विज्ञानियों का कहना है कि लैंटाना का कोई भी अंश बर्बाद नहीं जाता। लैंटाना प्लाई से बने फर्नीचर टीक, यूकेलिप्टस, पापुलर और शीशम की प्लाई से सस्ते पड़ेंगे।
एफआरआई के वरिष्ठ विज्ञानी डा. परमजीत सिंह का कहना है कि गांवों में जाकर डाई बनाने का लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसे हाइड्रोलिक मशीन से दबाया जाता है। अगर इसे गांवों में शुरू कर दिया जाए तो पलायन रुकेगा। विशेष उपकरण से उखाड़ने पर यह जड़ भी नहीं जमा पाएगी। स्वयं सेवी संस्थाएं यूपी, हिमाचल प्रदेश के गांवों में जाकर प्रशिक्षण दे रही हैं।
लैंटाना को व्यवसायिक बनाने की जरूरत
सगंध पाद केंद्र के प्रभारी नृपेंद्र चौहान का कहना है कि लैंटाना से सुगंधित तेल निकलता है। इससे एरोमा थेरेपी होती है। इसकी डाई और तेल बनता है। इस संबंध में केंद्र पायलट प्रोजेक्ट चला रहा है। इसकी मार्केटिंग की जरूरत है।