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हिंदी हैं हम अभियान : हिंदी को बनाना होगा रोजगार की भाषा तभी बनेगी यह राष्ट्रभाषा

Wed, 05 Aug 2020 04:09 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, काशीपुर
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान शुरू किया है। इस कड़ी के तहत अमर उजाला ने साहित्यकारों, हिंदी के प्रोफेसरों, शिक्षकों और कवियों के साथ वेबीनार आयोजित किया। सभी ने अमर उजाला की इस पहल को समय की जरूरत बताते हुए अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

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अधिकतर वक्ताओं का यही कहना है कि हिंदी को हमें रोजगार की भाषा बनाना होगा, तभी यह राष्ट्रभाषा बनेगी। मालूम हो कि हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए अमर उजाला ने ‘हिंदी है हम’ अभियान का शुभारंभ किया है।

छह हफ्ते चलने वाली इस शृंखला में हर वर्ग के प्रतिभागियों को हर हफ्ते प्रमाणपत्र और किताबों सहित उपहार दिए जाएंगे। इसमें भाग लेने के लिए आपको 30 सेकेंड से लेकर अधिकतम 59 सेकेंड का वीडियो रिकॉर्ड करके हमें वाट्सएप नंबर - 9711616205 पर भेजना है। खुद भी हिस्सा बनें और अपने दोस्तों-परिचितों और पूरे परिवार को सहभागी बनने को प्रेरित करें...

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हिंदी विषय में फेल होने लगे हैं हमारे बच्चे

हमें बड़ी निराशा होती है और यह सोचनीय बिंदु भी है कि हमारे बच्चे हिंदी विषय में फेल होने लगे हैं। हिंदी में एक आंतरिक ऊर्जा है, हिंदी को दबाने के भरसक प्रयत्न किए गए हैं, लेकिन ये सभी नाकाम रहे हैं। ‘हिंदी हैं हम’ के जरिये हिंदी को ऊंचे मुकाम पर पहुंचाने की अमर उजाला की पहल सराहनीय है।
- डॉ. देव सिंह पोखरिया, सेवानिवृत्त प्रोफेसर अल्मोड़ा

आज व्यक्ति सोचता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी नहीं जानेगा तो वह जीवन में सफल कैसे होगा। बस अंग्रेजियत की इसी मानसिकता ने हिंदी का बेड़ा गर्क किया है। जब तक भाषा के प्रति राष्ट्रीय चरित्र हमारे भीतर नहीं जागेगा तब तक भाषा का कोई सांविधानिक समाधान नहीं हो पाएगा। यदि हिंदी को बाजार की भाषा बना दिया जाए तो निश्चित तौर पर लोग हिंदी पर जोर देंगे और बच्चों को हिंदी पढ़ने, बोलने और सीखने के लिए प्रेरित करेंगे।
-प्रो. शम्भूदत्त पांडेय शैलेय, रुद्रपुर डिग्री कॉलेज

कौशल विकास में जो हिंदी दम तोड़ रही है, इसमें सिर्फ  पारिवारिक इच्छाशक्ति की कमी है। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाए जाने की आवश्यकता है। सरकार को दृढ़ निश्चय से जो भी उत्पाद, जिनमें अंग्रेजी में लेबल लगा रहता है, उसकी जगह हिंदी में लिखना अनिवार्य कर देना चाहिए क्योंकि विश्व का सबसे बड़ा बाजार भारत है। लिहाजा, इस बाजार में जिसे भी प्रवेश करना होगा उसे हिंदी सीखनी ही पड़ेगी।
-डॉ. हरनाम सिंह, सहायक आचार्य, दीन दयाल उपाध्याय कौशल केंद्र

देश के 29 राज्यों  में 52 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं। हिंदी का इतना प्रचार प्रसार हुआ है कि फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, नेपाल, यूएई आदि कई देशों में हिंदी भाषा बोली जाती है। हिंदी का अंतरराष्ट्रीय मार्केट बन चुका है लेकिन हमारे देश में नई पीढ़ी इससे दूर हो रही है। अभिभावकों को हिंदी की महत्ता समझनी होगी और बच्चों को हिंदी सीखने, बोलने और पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा।
-ओम शंकर मिश्रा, प्रवक्ता एवं कवि पंतनगर इंटर कॉलेज

हिंदी के उन्नयन के लिए जो लोग कार्य कर रहे हैं, उन्हें हम प्रोत्साहित नहीं कर पा रहे हैं। नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा छह तक की शिक्षा मातृभाषा में कराने का प्रावधान किया गया तो कुछ राज्य इसके विरोध में आ गए। कहने को नीति निर्धारकों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे दिया है पर अभी तक इसे राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं मिला है। हिंदी को लोकप्रिय बनाना है तो इसके प्रचार-प्रसार के लिए ईमानदारी से काम करना पड़ेगा।
-संजय सिंह जनौटी,  काफलीगैर बागेश्वर
 

अंग्रेजी को दी जा रही है अधिक मान्यता

जिस प्रकार विभिन्न प्रतियोगिताओं में अंग्रेजी को अधिक मान्यता दी जा रही है, ठीक उसी प्रकार हमें भी हिंदी के समकक्ष अवधी, संस्कृत जैसी भाषाओं के साथ क्षेत्रीय भाषाओं को आगे लाना चाहिए क्योंकि हिंदी में कई भाषाओं का समावेश है। हिंदी आज इसलिए समृद्ध नहीं हो पा रही है क्योंकि हम अंग्रेजी को अधिक महत्व दे रहे हैं। हालात यह हो गए हैं कि हमारे बच्चे हिंदी में फेल होने लगे हैं।
-डॉ. राधा वाल्मीकि, प्रवक्ता एवं कवयित्री, पंतनगर इंटर कॉलेज

किसी भी भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि उस भाषा में श्रेष्ठ साहित्य की रचना हो, जिससे उस भाषा के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़े। हमें लगता है कि हिंदी को बढ़ावा देने के लिए श्रेष्ठ साहित्य रचना की आवश्यकता है। इस दिशा में अमर उजाला भी अपने स्तर से शब्दिता और मनोरंजन के माध्यम से प्रयास कर रहा है।
-महेश चंद्र पुनेठा

हमारी भाषा ही हमें संस्कृति से जोड़ती है, पर दुर्भाग्य यह है कि हिंदी जैसे विषय में इस बार हमारे प्रदेश के आठ हजार और यूपी में आठ लाख बच्चे फेल हो गए। हिंदी को समृद्ध करने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
-नीलाक्षी जोशी, विभाग प्रभारी हिंदी, पिथौरागढ़

हिंदी बाजार की भाषा कैसे बनेगी जब लोगों को इस पर विश्वास ही नहीं है। हिंदी भाषा को संजीवनी देने के लिए तीन मुख्य बातें हैं जिन्हें समझना होगा। इनमें भाषा के प्रति आकर्षण, भरोसा और उस पर निर्भरता जब तक यह नहीं
होगा हिंदी समृद्ध नहीं हो सकती है। इसलिए हमें सबसे पहले हिंदी को प्रचारित और प्रसारित करके नई पीढ़ी के मन में हिंदी के प्रति आकर्षण जगाना होगा। हिंदी हैं हम अभियान से अमर उजाला ने यह प्रयास शुरू कर दिया है। हम सभी को इस कार्य के लिए आगे आना होगा।
- डॉ. राजीव जोशी, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बागेश्वर
 
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हिंदी दिन प्रतिदिन अपना महत्व खोती जा रही है

आज हिंदी पाठकों एवं बाल पत्रिकाओं की संख्या दिन पर दिन घट रही है। इसकी वजह है हिंदी के प्रति लोगों का आकर्षण कम होना। प्रत्येक अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम से पढ़े। इस कारण जहां सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या घट रही है वहीं प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों में बढ़ रही है। इससे यह साबित होता है कि हिंदी दिन प्रतिदिन अपना महत्व खोती जा रही है। आज  हिंदी को जीवन देने के लिए हिंदी को रोजगार का साधन बनाना होगा।
-रमेश पांडेय, साहित्यकार, पूर्व प्रधानाचार्य

हिंदी की समृद्धि के लिए अभिभावकों को आगे आना होगा क्योंकि सर्वप्रथम बच्चे घर से ही सीखते हैं। बच्चों का सारा जोर अंग्रेजी, गणित और विज्ञान विषय में रहता है, लेकिन हिंदी को विद्यार्थी हल्के में लेते हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों को हिंदी विषय की जरूरत समझानी होगी।
-श्वेता चौहान, शिक्षिका हिंदी

वर्तमान परिदृश्य में हिंदी की समकक्ष क्षेत्रीय भाषाओं में अध्ययन-अध्यापन सुनिश्चित करना चाहिए। हिंदी पूरे विश्व में आगे बढ़ रही है। जरूरत है कि भारत में इसे अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाए। अंग्रेजी का बुखार हमारे दिमाग के अंदर तक घुस गया है, जिसके दबाव में हिंदी किसी कोने में दुबक सी गई है। हमें अपनी भाषा के प्रति जागरूक होना होगा और उसे उसकी पहचान दिलानी होगी।
- डॉ. हेम चंद्र दुबे, राजकीय महाविद्यालय गरुड़ बागेश्वर

14 सितंबर को सिर्फ हिंदी दिवस मनाने से हिंदी का उत्थान नहीं होगा, बल्कि हमें अपनी भाषा, लेखनी और बोलचाल में भी इसे समाहित करना होगा।
-अनिल सारस्वत, ओज कवि, काशीपुर
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