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बिच्छू घास बदलेगा किसानों की तकदीर

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कर्णप्रयाग। बिच्छू घास (कंडाली) अब ग्रामीण काश्तकारों की किस्मत बदलने में मददगार साबित होगी। कालेश्वर में आयोजित हिमालयन कान्क्लेव के दौरान बिच्छू घास के रेशे खरीदने के लिए करीब 23 लाख का निवेश किया गया है।
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बिच्छू घास को अंग्रेजी में नेटल कहा जाता है। इसका बॉटनिकल नाम अर्टिका डाइओका है। कुमाऊंनी में इसे सिसूण और गढ़वाल में कंडाली कहते हैं। प्रदेश के मध्य हिमालयी क्षेत्र में होने वाली बिच्छू घास अब किसानों की आर्थिकी बदलने में मददगार साबित होगी। हालांकि पिछले दो वर्षों से संबंधित विभाग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। ब्लाक के मंगरोली में रेेशा बनाने की इकाई स्थापित कर यहां रेशा तैयार किया जा रहा है। इकाई के स्वामी और लघु उद्यमी बचन सिंह रावत कहते हैं कि तैयार रेशे से शॉल, वास्कट तैयार किए जा रहे हैं। हिमालयन कान्क्लेव में प्रदर्शनी के बाद विभिन्न कंपनियों ने इन रेशों को खरीदने की इच्छा जताई। रूरल इंडिया क्राफ्ट ने बिच्छू घास धागा खरीदने के लिए 16 लाख और पूजा सिल्क हॉउस ने 5.30 लाख का अनुबंध किया है। जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक डा. एमएस सजवाण ने कहा कि क्षेत्र में बिच्छू घास का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे।

बिटामिन ए, बी, डी और आयरन होता है भरपूर
डा. एमएस सजवाण बताते हैं कि बिच्छू घास में बिटामिन ए, बी, डी और आयरन भरपूर मात्रा में होता है। साथ ही इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, एनर्जी, कोलस्ट्रोल जीरो, विटामिन ए, सोडियम, कैल्शियम की मात्रा भी होती है। पहाड़ में दशकों पहले से बिच्छू घास का साग बनाने में उपयोग में किया जा रहा है।
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