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हिन्दू धर्म की रक्षा, अस्तित्व के लिए वेदों का प्रचार प्रसार जरुरी

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार। द्धार।
वेद दुनिया के प्रथम धर्म ग्रंथ हैं। इसके आधार पर ही दुनिया के अन्य मजहबों की उत्पत्ति हुई। जिन्होंने वेदों के ज्ञान को अपने- अपने तरीके से भिन्न- भिन्न भाषा में प्रचारित किया। वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है। सामान्य भाषा में वेद का अर्थ होता है ज्ञान तथा वेद पुरातन ज्ञान विज्ञान का अथाह भंडार है। यह बातें आनंद भैरव श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के स्वामी शिवमपुरी महराज ने कही।
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उन्होंने हिंदू धर्म के अस्तित्व के लिए वेदों के प्रचार- प्रसार को जरूरी बताया। कहा कि इसमें मानव की हर समस्या का समाधान है। वेदों में ब्रह्म, ईश्वर, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक, नियम इतिहास, रीति रिवाज समेत सभी विषयों से संबंधित ज्ञान है। एक ग्रंथ के अनुसार ब्रह्माजी के मुख से चारों वेदों की उत्पत्ति हुई है । वेद मानव सभ्यता के सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28000 पांडुलिपियां भारत में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रखी हुई है, इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियां बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ईसवी पूर्व की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पदों की सूची 38 है। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद क्रमश: चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं। वेद के ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार विभाग हैं। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।
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कहा कि वेद सर्व शक्तिमान ईश्वर की वाणी है। यह परमेश्वर की प्रेरणा का फल है।
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