देहरादून। केदार बाबा की घाटी में मृत्यु मात्र से मोक्ष नहीं मिल जाता। पुराणों में उल्लेख है कि मोक्ष के लिए विधिविधान पूर्वक अंतिम संस्कार जरूरी है। शव न मिलने की स्थिति में पर्णसर श्राद्ध आवश्यक हो जाता है।
ज्योतिषियों की मानें तो जिन लोगों के शव नहीं मिले हैं, उनके अंतिम संस्कार के लिए अलग विधि है। पर्णसर श्राद्ध के तहत पंडित कुशा (विशेष प्रकार की घास) का पुतला बनवाते हैं। पुतले के सिर के पास दीपक जलाया जाता है। दीपक के शांत (बुझने पर) होने के बाद पुतले को गंगा तट पर जलाया जाता है। पुतले की राख गंगाजी में प्रवाहित कर दी जाती है। इसके बाद मृत व्यक्ति की क्रिया में बैठा जाता है। ऐसे लोगों की नारायण बलि और पिंडदान भी आवश्यक माना गया है।
पुराणों में है जिक्र
उत्तराखंड विद्वत सभा के उपाध्यक्ष आचार्य भरत राम तिवारी बताते हैं कि ब्रह्मांड पुराण, अग्नि पुराण सहित अन्य धार्मिक पुराणों में पर्णसर श्राद्ध का विवरण मिलता है। हिंदू धर्म में मृत व्यक्ति के शरीर को दफनाया नहीं जाता बल्कि जलाया जाता है। केदारनाथ में जो लोग मलबे में दफन हो गए, उनका पूर्णत: क्रिया-कर्म आवश्यक है।
पुराणों में अंतिम संस्कार का जिक्र
ब्राह्मण सभा के प्रधान आचार्य पवन शर्मा कहते हैं कि धार्मिक पुराणों में अंतिम संस्कार कई प्रकार का है। जिस प्रकार से व्यक्ति की मौत होगी, उसी अनुसार उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। बात सिर्फ केदारघाटी की नहीं है। यदि किसी व्यक्ति की मौत सर्प दंश से होती है, तो उसे 6 माह दफनाने के बाद ही जलाया जाता है।
मोक्ष-कामना के लिए यज्ञ
ब्राह्मण सभा की ओर से केदारनाथ में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए तीन घंटे तक पाठ और यज्ञ का आयोजन किया गया। प्रकाश विहार स्थित परशुराम मंदिर में विष्णु-सहस्त्रनाम का पाठ हुआ। इस मौके पर ब्राह्मणों ने शोक-संवेदनाएं व्यक्त की।