हॉकी के जादूगर ध्यानचंद के पास एक बार गेंद आ गई तो उनसे गेंद हासिल करना विपक्षी खिलाड़ियों के लिए एक टेढ़ी खीर होता था। दुनिया भर में हॉकी के अपने कौशल से प्रसिद्ध होने वाले ध्यानचंद को भारत में अपने अंतिम दिनों में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। यह एक गहन चर्चा का विषय है। मीडिया के अनुसार वह अपनी उपेक्षा से इतने दुखी थे कि वह अपने परिवार के सदस्यों को हॉकी खेलने की अनुमति नहीं देते थे।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि उनका नाम ध्यानचंद नहीं बल्कि ध्यानसिंह था। सिंह से उनके चंद होने के पीछे की वजह यह है कि ध्यानचंद रात में हॉकी की प्रेक्टिस किया करते थे। चंद को हिंदी में चांद बोलते हैं। वह रात में ही हॉकी खेला करते थे। और रात में ही चांद आसमान में रहता था। इसलिए उनके करीबी उन्हें सिंह की बजाय ध्यानचंद कहकर पुकारने लगे।
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बचपन में कुश्ती का शौक रखने वाले ध्यानचंद ने पूरे करियर में करीब 400 गोल किए। ध्यानचंद ने महज 16 साल की उम्र में सेना में प्रवेश किया। 21 साल की उम्र में टीम इंडिया में शामिल हुए। ध्यानचंद का निधन 3 दिसंबर 1979 को हुआ। ध्यानचंद को भारत रत्न का सम्मान दिलाने के लिए देश में एक बार फिर मुहिम चलाई जा रही है। ध्यानचंद अगर यह सम्मान पाने में कामयाब होते हैं तो वह यह सम्मान पाने वाले दूसरे खिलाड़ी होंगे।
ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने के लिए हस्ताक्षर करें यहां- goo.gl/hYuwMF