सेंट्रल बंगलुरू के चर्च स्ट्रीट में पांच शानदार सेकंड हैंड बुकस्टोर्स हैं। इनमें से एक से मैंने हाल ही में एक ऐसी किताब ली, जिसके बारे में मैंने सुना नहीं था और जो कि एक ऐतिहासिक हस्ती के बारे में है, जिन्हें समझने में यह बड़ा योगदान करेगी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस: ए मलयेशियन पर्सपेक्टिव नामक यह किताब 1992 में क्वालालंपुर स्थित नेताजी सेंटर ने प्रकाशित की थी। इस किताब का ध्येय 'मलय और सिंगापुर में रहने वाले उन हजारों भारतीयों की भूमिका को सामने लाना है, जिन्होंने नेताजी को भारत को आजाद कराने के उनके लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापक समर्थन दिया था।'
मैं यह किताब खरीद कर घर ले आया और इसे पढ़ने के बाद मैंने पाया कि इसकी विषयवस्तु काफी प्रभावित करने वाली है। इसके पन्ने विभिन्न आस्थाओं की एकजुटता की भावना से भरे हुए हैं। इसमें सहयोग करने वाले सारे लोग आईएनए के पूर्व सैनिक हैं, जिनमें मुस्लिम, हिंदू, सिख और ईसाई शामिल हैं, यह विविधता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बोस की सेना सही मायने में भारतीय बनी रहना चाहती थी। इसमें शामिल एक लेख में कहा गया है, 'आईएनए में बिताए वर्षों में जीवन का एक शानदार पहलू भारतीय समुदाय के विभिन्न समूहों की एकता की भावना से जुड़ा था। मुक्ति के उत्साह ने भाषा, धर्म और जाति की सारी बाधाओं को पार कर लिया था, जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ।'
इस अज्ञात किताब की दूसरी विषयवस्तु नेताजी के लिए लैंगिक समानता के महत्व पर केंद्रित है। जैसा कि कर्नल प्रेम सहगल ने लिखा, बोस ने जापानियों और कुछ संकीर्ण भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट नामक एक महिला कोर के गठन का फैसला किया। इस रेजिमेंट का नेतृत्व सहगल की भावी पत्नी जानी-मानी डॉक्टर फौजी कैप्टन लक्ष्मी ने किया।
इसकी तीसरी विषयवस्तु महात्मा गांधी के प्रति आईएनए के अनेक सैनिकों द्वारा व्यक्त गहरे सम्मान के रूप में है। एक पू्र्व सैनिक ने लिखा, 'भारत में बचपन के अपने शुरुआती वर्षों में मैंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के हरेक कोने तक राष्ट्रवाद की भावना का प्रवाह देखा था।' तो एक अन्य ने लिखा, 'मैंने महात्मा गांधी के अलावा किसी और अन्य भारतीय की भारतीय जनमानस में ऐसी सम्मोहक पकड़ नहीं देखी, जैसी कि नेताजी की मलय में थी।' एक लेखक का तो नाम ही एम नाथन गांधी है।
हिंदुत्व के विचारकों ने सुभाष बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मरणोपरांत प्रतिद्वंद्विता दिखाने का प्रयास किया है। रुद्रांग्शु मुखर्जी ने इन दोनों पर केंद्रित अपनी किताब में दिखाया है कि हिंसा के सवाल तथा, अंग्रेजों और जापानियों में अधिक बुरा कौन जैसे मुद्दे पर असहमतियों के बावजूद नेहरू और बोस अंतर धार्मिक सद्भाव, लैंगिक समानता तथा महात्मा गांधी के प्रति आसक्ति जैसे केंद्रीय विषयों पर एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।
उल्लेखनीय है कि नेताजी ने आईएनए की ब्रिगेडों के नाम गांधी, मौलाना आजाद और खुद नेहरू के नाम पर रखे थे। विचारकों ने यह झूठ प्रचारित किया है कि नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने बोस के सम्मान या उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ नहीं किया। वास्तव में नेशनल आर्काइव के सार्वजनिक किए गए रिकॉर्ड दिखाते हैं कि बोस के निधन के बाद नेहरू सरकार ने वर्षों तक उनकी पत्नी को वित्तीय मदद प्रदान की।