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नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इसलिए भी याद रखें

रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 25 Aug 2019 01:29 AM IST
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस

सेंट्रल बंगलुरू के चर्च स्ट्रीट में पांच शानदार सेकंड हैंड बुकस्टोर्स हैं। इनमें से एक से मैंने हाल ही में एक ऐसी किताब ली, जिसके बारे में मैंने सुना नहीं था और जो कि एक ऐतिहासिक हस्ती के बारे में है, जिन्हें समझने में यह बड़ा योगदान करेगी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस: ए मलयेशियन पर्सपेक्टिव नामक यह किताब 1992 में क्वालालंपुर स्थित नेताजी सेंटर ने प्रकाशित की थी। इस किताब का ध्येय 'मलय और सिंगापुर में रहने वाले उन हजारों भारतीयों की भूमिका को सामने लाना है, जिन्होंने नेताजी को भारत को आजाद कराने के उनके लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापक समर्थन दिया था।'

मैं यह किताब खरीद कर घर ले आया और इसे पढ़ने के बाद मैंने पाया कि इसकी विषयवस्तु काफी प्रभावित करने वाली है। इसके पन्ने विभिन्न आस्थाओं की एकजुटता की भावना से भरे हुए हैं। इसमें सहयोग करने वाले सारे लोग आईएनए के पूर्व सैनिक हैं, जिनमें मुस्लिम, हिंदू, सिख और ईसाई शामिल हैं, यह विविधता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बोस की सेना सही मायने में भारतीय बनी रहना चाहती थी। इसमें शामिल एक लेख में कहा गया है, 'आईएनए में बिताए वर्षों में जीवन का एक शानदार पहलू भारतीय समुदाय के विभिन्न समूहों की एकता की भावना से जुड़ा था। मुक्ति के उत्साह ने भाषा, धर्म और जाति की सारी बाधाओं को पार कर लिया था, जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ।'



इस अज्ञात किताब की दूसरी विषयवस्तु नेताजी के लिए लैंगिक समानता के महत्व पर केंद्रित है। जैसा कि कर्नल प्रेम सहगल ने लिखा, बोस ने जापानियों और कुछ संकीर्ण भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट नामक एक महिला कोर के गठन का फैसला किया। इस रेजिमेंट का नेतृत्व सहगल की भावी पत्नी जानी-मानी डॉक्टर फौजी कैप्टन लक्ष्मी ने किया।

इसकी तीसरी विषयवस्तु महात्मा गांधी के प्रति आईएनए के अनेक सैनिकों द्वारा व्यक्त गहरे सम्मान के रूप में है। एक पू्र्व सैनिक ने लिखा, 'भारत में बचपन के अपने शुरुआती वर्षों में मैंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के हरेक कोने तक राष्ट्रवाद की भावना का प्रवाह देखा था।' तो एक अन्य ने लिखा, 'मैंने महात्मा गांधी के अलावा किसी और अन्य भारतीय की भारतीय जनमानस में ऐसी सम्मोहक पकड़ नहीं देखी, जैसी कि नेताजी की मलय में थी।' एक लेखक का तो नाम ही एम नाथन गांधी है। 

हिंदुत्व के विचारकों ने सुभाष बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मरणोपरांत प्रतिद्वंद्विता दिखाने का प्रयास किया है। रुद्रांग्शु मुखर्जी ने इन दोनों पर केंद्रित अपनी किताब में दिखाया है कि हिंसा के सवाल तथा, अंग्रेजों और जापानियों में अधिक बुरा कौन जैसे मुद्दे पर असहमतियों के बावजूद नेहरू और बोस अंतर धार्मिक सद्भाव, लैंगिक समानता तथा महात्मा गांधी के प्रति आसक्ति जैसे केंद्रीय विषयों पर एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। 

उल्लेखनीय है कि नेताजी ने आईएनए की ब्रिगेडों के नाम गांधी, मौलाना आजाद और खुद नेहरू के नाम पर रखे थे। विचारकों ने यह झूठ प्रचारित किया है कि नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने बोस के सम्मान या उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ नहीं किया। वास्तव में नेशनल आर्काइव के सार्वजनिक किए गए रिकॉर्ड दिखाते हैं कि बोस के निधन के बाद नेहरू सरकार ने वर्षों तक उनकी पत्नी को वित्तीय मदद प्रदान की।

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
सेंट्रल बंगलुरू के चर्च स्ट्रीट में पांच शानदार सेकंड हैंड बुकस्टोर्स हैं। इनमें से एक से मैंने हाल ही में एक ऐसी किताब ली, जिसके बारे में मैंने सुना नहीं था और जो कि एक ऐतिहासिक हस्ती के बारे में है, जिन्हें समझने में यह बड़ा योगदान करेगी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस: ए मलयेशियन पर्सपेक्टिव नामक यह किताब 1992 में क्वालालंपुर स्थित नेताजी सेंटर ने प्रकाशित की थी। इस किताब का ध्येय 'मलय और सिंगापुर में रहने वाले उन हजारों भारतीयों की भूमिका को सामने लाना है, जिन्होंने नेताजी को भारत को आजाद कराने के उनके लक्ष्य को हासिल करने के लिए व्यापक समर्थन दिया था।'

मैं यह किताब खरीद कर घर ले आया और इसे पढ़ने के बाद मैंने पाया कि इसकी विषयवस्तु काफी प्रभावित करने वाली है। इसके पन्ने विभिन्न आस्थाओं की एकजुटता की भावना से भरे हुए हैं। इसमें सहयोग करने वाले सारे लोग आईएनए के पूर्व सैनिक हैं, जिनमें मुस्लिम, हिंदू, सिख और ईसाई शामिल हैं, यह विविधता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि बोस की सेना सही मायने में भारतीय बनी रहना चाहती थी। इसमें शामिल एक लेख में कहा गया है, 'आईएनए में बिताए वर्षों में जीवन का एक शानदार पहलू भारतीय समुदाय के विभिन्न समूहों की एकता की भावना से जुड़ा था। मुक्ति के उत्साह ने भाषा, धर्म और जाति की सारी बाधाओं को पार कर लिया था, जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ।'

इस अज्ञात किताब की दूसरी विषयवस्तु नेताजी के लिए लैंगिक समानता के महत्व पर केंद्रित है। जैसा कि कर्नल प्रेम सहगल ने लिखा, बोस ने जापानियों और कुछ संकीर्ण भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट नामक एक महिला कोर के गठन का फैसला किया। इस रेजिमेंट का नेतृत्व सहगल की भावी पत्नी जानी-मानी डॉक्टर फौजी कैप्टन लक्ष्मी ने किया।

इसकी तीसरी विषयवस्तु महात्मा गांधी के प्रति आईएनए के अनेक सैनिकों द्वारा व्यक्त गहरे सम्मान के रूप में है। एक पू्र्व सैनिक ने लिखा, 'भारत में बचपन के अपने शुरुआती वर्षों में मैंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश के हरेक कोने तक राष्ट्रवाद की भावना का प्रवाह देखा था।' तो एक अन्य ने लिखा, 'मैंने महात्मा गांधी के अलावा किसी और अन्य भारतीय की भारतीय जनमानस में ऐसी सम्मोहक पकड़ नहीं देखी, जैसी कि नेताजी की मलय में थी।' एक लेखक का तो नाम ही एम नाथन गांधी है। 

हिंदुत्व के विचारकों ने सुभाष बोस और जवाहरलाल नेहरू के बीच मरणोपरांत प्रतिद्वंद्विता दिखाने का प्रयास किया है। रुद्रांग्शु मुखर्जी ने इन दोनों पर केंद्रित अपनी किताब में दिखाया है कि हिंसा के सवाल तथा, अंग्रेजों और जापानियों में अधिक बुरा कौन जैसे मुद्दे पर असहमतियों के बावजूद नेहरू और बोस अंतर धार्मिक सद्भाव, लैंगिक समानता तथा महात्मा गांधी के प्रति आसक्ति जैसे केंद्रीय विषयों पर एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। 

उल्लेखनीय है कि नेताजी ने आईएनए की ब्रिगेडों के नाम गांधी, मौलाना आजाद और खुद नेहरू के नाम पर रखे थे। विचारकों ने यह झूठ प्रचारित किया है कि नेहरू और उनकी कांग्रेस सरकार ने बोस के सम्मान या उनकी स्मृति को संजोने के लिए कुछ नहीं किया। वास्तव में नेशनल आर्काइव के सार्वजनिक किए गए रिकॉर्ड दिखाते हैं कि बोस के निधन के बाद नेहरू सरकार ने वर्षों तक उनकी पत्नी को वित्तीय मदद प्रदान की।

इस किताब में, जो मुझे बंगलुरू में मिली, नेताजी की बेटी की भारत यात्रा के संबंध में एक सुंदर निबंध है, जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह से होती है, 'फरवरी, 1961 में एक 18 वर्षीय इंडो-जर्मन (भारतवंशी जर्मन) का भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अति विशिष्ट व्यक्ति जैसा सत्कार किया, जबकि यह लड़की अपनी निजी यात्रा पर आई थी। भारतीय राज्यों की यात्रा के दौरान वह संबंधित राज्यपालों की मेहमान थीं। उसके सम्मान में कई समारोह हुए... यह थीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिलि शेंकल की बेटी अनिता बोस।'

एक और तथ्य जो हिंदुत्ववादियों को परेशान करेगा, वह है बोस की भाषायी प्राथमिकताओं से संबंधित चिंता। बांग्ला, बेशक उनकी प्रथम भाषा थी, लेकिन जैसा कि किन्हीं के आर दास ने यहां लिखा है, 'मैंने गौर किया कि नेताजी अंग्रेजी से बेहतर उर्दू बोलते थे। वह साधारण वाक्य बोलते थे, जिनका गठन खूबसूरत होता था और वह इतनी कुशलता से अपनी बात कहते थे कि उर्दू जानने वाले लोग चमत्कृत हो जाते थे।'

यह किताब इस बात का खुलासा भी करती है कि आईएनए को बड़ी वित्तीय मदद देने वाले मुस्लिम कारोबारी थे। उनमें से एक ईरानी कालीनों के समृद्ध कारोबारी आमिर मोहम्मद खान थे। उनके भीतर राष्ट्रवाद इतने गहरे तक समाया था कि उन्होंने न केवल आईएनए के खजाने को भारी धन दिया, बल्कि अपने बड़े बेटे वजीर खान को भारत-बर्मा युद्ध मैदान में लड़ने के लिए भी भेजा था।

सुभाष बोस का 1945 में निधन हो गया। इसके दो वर्ष बाद भारत आजाद हो गया। जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में लाल किले से जब अपना पहला भाषण दिया, तो उन्होंने इसकी शुरुआत उनके साझा गुरु की प्रशंसा से की थी। 'देश ने महात्मा गांधी के शानदार नेतृत्व और मार्गदर्शन में स्वतंत्रता हासिल की है। लड़ाई की हमारी तकनीक दूसरे देशों से अलग थी। कई बार हम लड़खड़ाए और गिरे लेकिन अंत में हम अपने लक्ष्य तक पहुंच गए। यदि इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को दिया जा सकता है तो वह हैं गांधी जी। '

नेहरू ने आगे कहाः ' आज के दिन हमें उन लोगों को याद करना चाहिए, जिन्होंने स्वतंत्रता के लक्ष्य के लिए त्याग किया और बलिदान दिया। मेरे लिए सबका नाम लेना जरूरी नहीं है, लेकिन मैं सुभाष चंद्र बोस का जिक्र किए बिना नहीं रह सकता जिन्होंने देश से बाहर जाकर विदेश में इंडियन नेशनल आर्मी की स्थापना की और देश की आजादी के लिए बहादुरी से लड़े। उन्होंने दूसरे देशों में यह झंडा फहराया और आज जब लाल किले में इसे फहराया जा रहा है, वह अपने स्वप्न को हकीकत में बदलता देखने के लिए मौजूद नहीं हैं। यह दिन उनकी वापसी का दिन होना चाहिए था, लेकिन दुख है कि वह इस दुनिया में नहीं हैं।'

जल्द ही शहीद होने वाले गांधी और पहले से दुनिया छोड़ चुके बोस की प्रशंसा करने के बाद नए प्रधानमंत्री ने कहा, 'सरकार की पहली जिम्मेदारी देश में शांति और स्थिरता कायम करना और सांप्रदायिक तनाव को कठोरता से कुचलने की होगी, जब कानून का पालन करने वाले नागरिकों को कष्टमय जीवन जीना पड़े तो कोई भी

सरकार किस काम की; जबकि अराजकता से निपटने में कोई भेदभाव नहीं हो सकता। यह कहना गलत है कि इस देश में किसी एक खास धर्म या पंथ का शासन होगा। वे सारे लोग जो इस झंडे के प्रति निष्ठा रखते हैं, उन्हें नागरिकता का समान अधिकार मिलेगा फिर वह किसी भी जाति या धर्म के हों।'

यदि 1947 में बोस जीवित होते और नियति के मोड़ पर नेहरू की जगह वह प्रधानमंत्री होते तो वह खुद भी अपने भाषण की शुरुआत महात्मा गांधी की प्रशंसा से ही करते। वह भी जोर देकर कहते कि यह कहना गलत है कि इस देश में किसी एक खास धर्म या पंथ का शासन होगा। नेताजी ऐसे थे, हिंदुत्व चाहेगा कि हम उन्हें भूल जाएं।
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