भारत में इस तरह की यह पहली बड़ी घटना थी, जिसमें ईशनिंदा का दोषी मानते हुए हिंसक शक्तियों द्वारा एक व्यक्ति का अंग भंग किया गया था। प्रो. जोसेफ ने परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनाए थे, जिसमें मोहम्मद साहब और इस्लाम पर प्रश्न थे। इसे मोहम्मद साहब का अपमान करार देकर उनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया गया था। जुलाई, 2010 में जब वह अपनी मां और बहन के साथ घर जा रहे थे, तब एक कुल्हाड़ीधारी आदमी उन्हें घसीटकर साथ ले गया और उनके पैर व हाथ काट दिए। 13 वर्ष बाद ऐसी भयानक घटना पर न्यायालय का पहला फैसला आया है! क्यों?
साफ है कि सरकार, पुलिस, प्रशासन और केरल का जागरूक माने जाने वाला सेक्यूलर नागरिक समाज सजग सक्रिय होता, तो स्थिति दूसरी होती। जानकारों ने जब इसके लिए पीएफआई को दोषी ठहराया, तो देश भर में मुस्लिम संगठनों और नेताओं के साथ एनजीओ, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ राजनीतिक दलों के नेता भी विरोध में सामने आ गए।
न्यायालय के फैसले ने फिर इस बात की पुष्टि की है कि पीएफआई कट्टरपंथी जिहादी आतंकवादी संगठन है। अदालत ने इस फैसले में ऐसी अनेक टिप्पणियां की हैं, जिन्हें पीएफआई से सहानुभूति रखने वालों को अवश्य देखना चाहिए। अदालत ने यद्यपि फैसला इस एक घटना पर सुनाया है, पर अपनी टिप्पणियों में उसने पीएफआई की विचारधारा और उसके चरित्र को स्पष्ट कर दिया है। प्रोफेसर जोसेफ की पत्नी को इस घटना से इतना आघात लगा कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। प्रोफेसर को मारने की धमकियां दी जा रही थीं, पर सरकार ने उनके लिए सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की।
क्या वाम मोर्चे को यह भारत के सेक्यूलर ताने-बाने के विरुद्ध नहीं लगता था? केरल में मुस्लिम मत पाने की छीना-झपटी का लाभ पीएफआई को मिलता रहा और उसे आतंकवादी या हिंसक संगठन मानने के लिए सरकार तैयार नहीं हुई। पीएफआई के कृत्यों की केरल से लेकर कर्नाटक एवं अन्य राज्यों में प्रमाण आते रहे, पर वाम मोर्चा सरकार नजर अंदाज करती रही। कांग्रेस के नेतृत्व वाले लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार का भी यही रवैया रहा। प्रोफेसर को नौकरी से भी निकाल दिया गया था। सामान्य प्रश्नपत्र बनाने वाले एक व्यक्ति को इस्लाम और पैगंबर विरोधी बता दिया गया। कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें नौकरी मिली। लेकिन आज भी सभी दोषियों को सजा नहीं मिल पाई है।
केरल में पीएफआई की गतिविधियां सामने आने के बावजूद उसे रोकने और कुचलने की स्वाभाविक जिम्मेदारी का पालन राज्य सरकार ने नहीं किया। इस घटना के बाद कानूनी एजेंसियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी का पालन न करने का परिणाम है कि आज तक मुख्य अपराधी गिरफ्त से बाहर है। ताजा फैसले में भी कुल 11 लोगों में से पांच को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया है। 18 लोग पहले ही बरी किए जा चुके हैं। यदि केंद्र और राज्य की सरकारें पहले संभल जातीं, तो पीएफआई देश के लिए इतना बड़ा खतरा नहीं बनता।
पीएफआई की शुरुआत केरल में तब हुई, जब सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद उसके सदस्यों ने पीएफआई नाम से संगठन आरंभ कर दिया। पीएफआई की गतिविधियां देश के अन्य भागों में सामने आने के साथ इसकी सूचना खुफिया एजेंसियों ने केंद्र और राज्य सरकारों तक अनेक बार पहुंचाई। यह चिंता की बात है कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाले सारे अपराधी तो अभी तक नहीं ही पकड़े गए, न्यायालय को भी फैसला देने में इतना वक्त लगा।