मुझे याद है कि बहुत पहले जब मैं खैबर पख्तूनख्वा के स्वात में पारिवारिक यात्रा पर गई थी, तो एक छोटी-सी पहाड़ी पर चढ़ी थी। वहां सड़क के किनारे भगवान बुद्ध की गोद में हाथ रखे हुए एक विशाल प्राचीन मूर्ति थी। मैं फोटो खिंचवाने की खातिर उनकी गोद में बैठने के लिए ऊपर चढ़ी थी। यह उस व्यक्ति के लिए वाकई बहुत चुनौतीपूर्ण रहा होगा, जिसने सदियों पहले पहाड़ी के बीच में इतनी विशाल मूर्ति बनाने में कामयाबी हासिल की थी।
अफसोस कि यह वही क्षेत्र है, जहां एक समय पाकिस्तान तालिबान ने कब्जा कर लिया था। यह देखना अजीब था कि जहां भगवान बुद्ध ने शांति और सहिष्णुता की शिक्षा दी थी, उसी इलाके पर आतंकवादियों का नियंत्रण था। लेकिन शुक्र है कि उन्होंने इन मूर्तियों को नष्ट नहीं किया।
दुख की बात यह है कि पाकिस्तान में बौद्धों की संख्या बहुत कम है। युवा पाकिस्तानियों की पीढ़ी अन्य धर्मों के लोगों से तो मिलती है, लेकिन शायद ही कभी किसी बौद्ध से मिलती है। पाठ्य-पुस्तकों में भी उनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, इसलिए अब सरकार एक ऐसे धर्म के बारे में जागरूकता लाने की कोशिश कर रही है, जो शांति और ज्ञान पर आधारित है।
पाकिस्तान का मीडिया नियमित रूप से दलाई लामा और भारत तथा चीन के बीच तनाव की खबरें प्रकाशित करता है, जो राजनीतिक होती हैं और जिनमें धर्म के लिए कोई जगह नहीं होती। मुझे याद है कि एक बार मैं थाईलैंड के एक विश्वविद्यालय में भगवान बुद्ध के वीडियो और तस्वीरें लेकर गई थी। जिस कमरे में मैं ये वीडियो और तस्वीरें दिखा रही थी, वहां बड़ी संख्या में बौद्ध मौजूद थे। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ, जब उन बौद्धों ने भगवान बुद्ध की छवि देख हाथ जोड़कर प्रणाम करना शुरू कर दिया।
विभाजन के बाद विभिन्न कारणों से अल्पसंख्यकों ने धीरे-धीरे पाकिस्तान छोड़ दिया और आज सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बाउरी बौद्ध 16,000 से अधिक हैं, जो ज्यादातर सिंध और पंजाब प्रांत में रहते हैं। पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों के कई पवित्र स्थल हैं, क्योंकि इन दोनों धर्मों के बहुत से लोग अब भी पाकिस्तान में रहते हैं। इसके अलावा समय-समय पर विदेशों से बड़ी संख्या में हिंदू और सिख अपने पवित्र स्थलों पर धार्मिक समारोहों में हिस्सा लेने के लिए यहां आते रहते हैं। हाल ही में करतारपुर कॉरिडोर के जरिये भारत और दुनिया भर के सिख यहां के पवित्र गुरुद्वारे मंे आशीर्वाद लेने आए थे।
इतिहास बताता है कि बौद्ध धर्म तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में गांधार पहुंच गया था। गांधार एक प्राचीन हिंदू साम्राज्य था, जो आज पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम और अफगानिस्तान के उत्तर पूर्व में स्थित है। आज पाकिस्तान में तक्षशिला की यात्रा को हिंदुओं और बौद्धों के लिए धार्मिक और ऐतिहासिक तीर्थ माना जाता है। साल भर आप पर्यटकों को देखेंगे, हालांकि ज्यादातर बौद्ध तक्षशिला के मोहरा मोराडू में कुषाणों द्वारा निर्मित एक प्राचीन स्तूप और मठ, जौलियन बौद्ध मठ, दो सिरों वाले ईगल स्तूप, धर्मराजिला और ध्यानस्थ बुद्ध को देखने के लिए आते हैं।
कुछ साल पहले खैबर पख्तूनख्वा के भामला स्तूप में सोते हुए बुद्ध की 1,700 साल पुरानी सबसे आकर्षक मूर्ति खोजी गई थी। समय-समय पर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि कुछ बौद्ध मूर्तियों को विदेशों में तस्करी करके ले जाया गया है और कई बार कुछ देशों ने इन मूर्तियों को वापस पाकिस्तान को लौटा दिया है, जिन्हें संग्रहालयों में रख दिया गया है। इस हफ्ते बौद्धों का एक विशाल प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आया था, जिसके बाद सरकार ने अब गांधार सांस्कृतिक प्राधिकरण स्थापित करने का निर्णय लिया। यह पहली गांधार विचार गोष्ठी थी, जो बौद्ध पर्यटन को बढ़ावा देने और दुनिया को पाकिस्तान का नरम चेहरा दिखाने के लिए आयोजित की गई थी। कोरिया इन दिनों खैबर पख्तूनख्वा और तक्षशिला में गंधारिया संरक्षण परियोजना चला रहा है।
गांधार सांस्कृतिक प्राधिकरण का उद्देश्य गांधार सभ्यता पर शोध कार्य को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर के विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक विभागों से संपर्क करना है। इसके पीछे एक प्रमुख पाकिस्तानी हिंदू डॉ. रमेश वांकवानी का दिमाग है, जो गांधार सांस्कृतिक प्राधिकरण पर प्रधानमंत्री की टास्क फोर्स के अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान सौभाग्यशाली है कि उसके पास गांधार है, जो महान प्राचीन संस्कृति का केंद्र होने के साथ-साथ बौद्धों के लिए धार्मिक तीर्थ स्थल भी है। इस बीच एक दिलचस्प घटना घटी।
विचार गोष्ठी में भाग लेने के लिए जब बौद्ध अतिथि इस्लामाबाद पहुंचे, तो उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए सशस्त्र बलों को तैनात देखा। पर थाईलैंड से आए अतिथि अनिल शाक्य, जो थाईलैंड में विश्व बौद्ध विश्वविद्यालय के मानद रेक्टर हैं, अपनी तस्वीरों को लेकर चिंतित दिखे, जिसमें सुरक्षा गार्ड उनके पीछे बंदूकें लेकर खड़े थे। उन्होंने कहा, 'मैं शांति का उपासक हूं और सबके लिए शांति की कामना करता हूं, लेकिन पाकिस्तान की यात्रा के दौरान दो बंदूकों के साथ मेरी तस्वीर खींची गई। सुरक्षा व्यवस्था ऐसी कड़ी होनी चाहिए, कि बंदूकें दिखाई न दें, पर जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल के लिए हमेशा तैयार रहें।' अगर वह पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र गांधार तक जाएंगे, तो उन्हें यह देखकर आश्चर्य होगा कि आज वहां पख्तून जनजातियां रहती हैं, जिनमें से हर कोई और कभी-कभी महिलाएं भी अपने साथ बंदूकें रखती हैं। यही यहां की परंपरा और संस्कृति है।