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काले जादू का काला सच

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अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में भौतिकी एवं खगोल विज्ञान के एक प्रोफेसर एडम फ्रैंक ने हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स के अपने एक लेख में बताया कि 1982 में हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 44 फीसदी अमेरिकी मानते थे कि भगवान ने इस सृष्टि की रचना की है।
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30 साल बाद सृष्टिवादियों की संख्या बढ़कर 46 फीसदी हो गई है। यह एक ऐसा वाद है, जिसमें माना जाता है कि इस पृथ्वी और ब्रह्मांड की रचना किसी अलौकिक शक्ति ने की है। यह वाद उद्भव के वैज्ञानिक सिद्धांत को खारिज करता है। अमेरिकी विचारों में सृष्टिवाद का 20वीं शताब्दी के ज्यादातर समय में मामूली महत्व रहा।

लेकिन फ्रैंक कहते हैं कि जब वह छात्र थे, उस समय बेहद कुशलतापूर्वक प्रयास करके इस विचारधारा की उत्पत्ति को विज्ञान के रूप में दोबारा स्थापित कर दिया गया और देश भर की कक्षाओं में इसकी घुसपैठ करा दी गई।
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अवैज्ञानिक होने के बावजूद कुछ दकियानूस किस्म के राजनेताओं ने अपने राजनीतिक करियर के लिए उत्पत्ति के सिद्धांत को खारिज कर दिया। सवाल यह है कि भारत जैसे बेहद धार्मिक देश में इसके क्या मायने हैं? दरअसल, 71 साल के डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के बाद अंधविश्वास और बुद्धिवाद जैसे विषय फिर चर्चा में आ गए हैं। पुणे के मशहूर तर्कवादी दाभोलकर देश में फैले अंधविश्वास के खिलाफ वर्षों से अभियान चला रहे थे और काला जादू जैसे तंत्र-मंत्र को एक कानून लाकर प्रतिबंधित करने के लिए करीब दो दशक से सरकार पर दबाव बना रहे थे।

उनकी हत्या के बाद देशभर में उपजे गुस्से के बीच महाराष्ट्र सरकार ने काला जादू, अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के निर्मूलन के लिए काफी समय से लंबित विधेयक को एक अध्यादेश की शक्ल में लाने का ऐलान कर दिया। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो अपने देश में इस तरह का यह पहला मामला होगा।

सबसे पहले 1995 में यह विधेयक राज्य विधानसभा में लाया गया था और अब तक कम से कम 29 बार इसमें संशोधन हो चुका है। इस दौरान सभी राजनीतिक दलों की सरकारें बनीं, लेकिन कट्टरवादी समूहों के दबाव में इसे पारित नहीं करवा सकीं, क्योंकि ये समूह इस कानून को ′हिंदू विरोधी′ बता रहे हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि आज भी आस्था के नाम पर काला जादू, टोना-टोटका और दूसरे अंधविश्वासों को खत्म करने के प्रयासों की मुखालफत करने वालों की अच्छी खासी तादाद है। एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अंधविश्वास केवल भारत में ही नहीं है, बल्कि अमेरिका में भी लोग सृष्टिवाद को पसंद करते हैं, जो विज्ञान और तर्कवाद को चुनौती देता है।

एक भारतीय होने के नाते मैं इस तरह के तर्क से बेचैन हूं। दाभोलकर धर्म और आस्था को चुनौती नहीं दे रहे थे और न ही अन्य तर्कवादी ऐसा करते हैं। अमेरिकी की तरह यह नास्तिकता बनाम सृष्टिवाद की बहस नहीं है, बल्कि भारत में यह तर्क व कारण बनाम अंधविश्वास व अज्ञान की बहस है।

यहां धर्म बनाम निरीश्ववाद की बात भी नहीं की जा रही है। आस्था निश्चित रूप से एक निजी मामला है। एक भारतीय के रूप में हर किसी को आस्था और विश्वास की स्वतंत्रता है। लेकिन अगर यही आस्था खुद किसी व्यक्ति के लिए या दूसरों के लिए नुकसानदायक हो जाए तो यह निजी मामला नहीं रह जाता।

ऐसे में यह मामला सार्वजनिक हो जाता है और लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों की तरह ही इसका भी समाधान निकाला जाना चाहिए। भारत में, अंधविश्वास खतरा-ए-जान भी हो सकता है और यह समस्या केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है।

हर साल सैकड़ों औरतों को प्रताड़ित किया जाता है और कई बार तो उनकी हत्या कर दी जाती है। इन औरतों का कसूर सिर्फ इतना है कि कुछ सिरफिरे लोग उन्हें डायन घोषित कर देते हैं। इसी तरह दैवीय शक्तियों को खुश करने के लिए बच्चों की बलि के मामले भी सामने आते हैं।

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, अकेले 2012 में ही टोने-टोटके के नाम पर 119 लोगों की हत्या हो गई। ये सरकारी आंकड़े हैं और यह बात भी किसी से छिपी नहीं है, बहुत से मामले पुलिस के पास दर्ज ही नहीं होते।

पिछले दिसंबर में नई दिल्ली में 12वें इंडियन साइंस कम्युनिकेशन कांग्रेस में बोलते हुए प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक और रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. दिनेश मिश्रा ने देश भर में अंधविश्वास के कारण काला जादू और टोने-टोटके की घटनाओं का जिक्र किया था और एक राष्ट्रीय कानून बनाने की मांग की थी। सवाल यह है कि जब इस समस्या के बारे में अच्छी तरह से पता है, तो इसके निदान के लिए इतने मामूली कदम क्यों उठाए गए हैं?

इसका कारण बहुत आसान है। दरअसल, टोना-टोटका इस देश में एक बहुत बड़ा धंधा है। दिल्ली में काले जादू का धंधा करने वाले एक शख्स ने खुद को काला जादू समाधान विशेषज्ञ बताते हुए सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट लिंक्डइन पर भी इसका प्रचार-प्रसार किया है।

उसकी वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वह एक काला जादू विशेषज्ञ बाबा है, जिसने न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर के हजारों परिवारों की समस्याओं का समाधान किया है। जाहिर है कि आम लोगों को मूर्ख बनाकर ठगी करने वालों पर शिकंजा कसने की अब तत्काल जरूरत है।
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