जी जरूर, बुजुर्गों ने तो नेकी करने की ही सीख दी है। पर इसका आजकल बड़ा नुकसान होने लगा है। इसलिए नया सबक यह है कि अच्छा काम हमेशा अच्छा नहीं होता।
अब देखिए न, पिछले दिनों रेत माफिया का बड़ा हल्ला मचा। किसी अधिकारी ने रेत माफिया के खिलाफ सख्ती दिखाई, तो उन्हें निलंबित होना पड़ गया। फायदा क्या हुआ? इस शहादत के बूते वह चुनाव लड़ जाएं, तो फायदा हो सकता है। क्योंकि चुनाव लड़कर घाटे में कोई नहीं रहता, सिवाय जनता के। विपक्षवाले टिकट देने को तो तैयार हो ही जाएंगे। पर युवा अधिकारी को नुकसान यह हुआ कि उन पर ईमानदारी का ठप्पा लग गया। अब उन्हें सारी जिंदगी ईमानदार रहना पड़ेगा। तय है कि इसका फायदा कुछ नहीं होनेवाला।
बात किसी अधिकारी की नहीं है। समस्या यह है कि अच्छा काम अब हमेशा अच्छा ही साबित नहीं होता, इसके खराब नतीजे सामने आने लगे हैं। अब देखिए, रेत माफिया का इतना हल्ला मचा। मीडिया दिन रात हंगामा किए रहा, तो सरकार भी कुछ सख्त हुई और प्रशासन भी सख्त हुआ। कहने को यह अच्छी बात है कि माफिया पर अंकुश लगा। पर रेत महंगी हो गई।
एक ट्रॉली रेत पहले जितने में मिलती थी, अब उससे दोगुने में मिल रही है। सो बुरे काम का बुरा नतीजा तो ठीक है, पर अच्छे काम का नतीजा बुरा क्यों आ रहा है। सदाचरण की शिक्षा में यह पाठ तो कभी नहीं पढ़ाया गया।
बात सिर्फ रेत की नहीं है। टेलीकॉम में इतना बड़ा घोटाला हुआ। छोटे-मोटे देश का तो बजट भी न होता होगा इतना, जितने का हमने घोटाला कर दिया। पर उसके बाद सरकार ने भविष्य में कोई ऐसा ही घोटाला होने से रोकने के लिए कदम उठाए, तो स्पेक्ट्रम बिकना ही बंद हो गया। टेलीकॉम सेवाएं महंगी हो गईं। जो सेवाएं निरंतर सस्ती होती जा रही थी, वे महंगी होने लगीं। बताइए, क्या फायदा हुआ अच्छाई का?
अब कोयला घोटाला रोको, तो कोयला महंगा। रेल घोटाला रोको, तो रेल महंगी। हाई-वे घोटाला रोको, तो सड़क का सफर महंगा। तो फिर ऐसी अच्छाई करने का फायदा ही क्या? सो होने दो भैया घोटाले। कम से कम रेत तो सस्ती मिलेगी। टेलीकॉम सेवाएं तो सस्ती मिलेंगी। कोयला तो सस्ता मिलेगा।
और देखो जी, घोटाले करनेवाले भी कुछ काम तो अच्छा करते ही हैं। मंदिर-मस्जिद के लिए चंदा देते हैं। भंडारे करते हैं, लंगर लगवाते हैं। और कई बार तो जी फ्री की दारू भी पिलाते हैं। नहीं क्या?