कहते हैं कि ज्ञान की दुनिया शक्ति से परे होती है। सत्ता एवं शक्ति का ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। किंतु अब नए शोधों से लगभग साबित हो चला है कि शक्तिवान ज्ञान की दुनिया पर भी शासन करता है या यों कहें, शक्ति ज्ञान संरचना के पूरे ढांचे को गहरे प्रभावित करती है।
उपनिवेशवाद ने पश्चिम को शक्तिवान बनाया। अतः पश्चिम को सिद्धांतों का जनक माना जाता है। माना जाता है कि समाज विज्ञान एवं विज्ञान की दुनिया में पश्चिम सिद्धांत रचता है और हम लोग पूरब के वासी या एशियाई मूल्कों के निवासी, उस सिद्धांत रचना के लिए अपने शोधों से आंकड़े उपलब्ध कराने का काम करते हैं।
अर्थात समाज विज्ञान की दुनिया में भारतीय समाज विज्ञानी दोयम दर्जे के माने जाते हैं। हालांकि पिछले कई दशकों में भारतीय समाज विज्ञानी जो पश्चिम के विश्वविद्यालयों में कार्यरत हैं, सिद्धांत रचना में भी लगे हैं। अमर्त्य सेन, रणजीत गुहा, गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक, दीपेश चक्रवर्ती का नाम उत्तर औपनिवेशिक सिद्धांतकारों, चिंतकों एवं विचारकों के रूप में अत्यंत आदर से लिया जाता है।
पश्चिमी चिंतक देरिदा, या ओरियन्टलिज्म से जुड़े अनेक विद्वान हालांकि भारतीय चिंतन के स्रोतों को अपनी सिद्धांत रचना में महत्वपूर्ण सिद्धांत उत्तक के रूप में उपयोग करते हैं। वे लोग बौद्ध चिंतक नागार्जुन या अनेक अन्य वैशेषिक चिंतकों से अपनी ज्ञान रचना के क्रम में संवाद करते दिखते हैं। किंतु हम लोग औपनिवेशिक पराधीनता के कारण ऐसी आत्मग्लानि से भरे हैं कि अपने ही ज्ञान स्रोतों के महत्व को या तो समझते नहीं या समझना नहीं चाहते।
प्राक् औपनिवेशिक भारत में सिद्धांत रचना एवं ज्ञान रचना का काम उच्च स्तर का था, तब भारतीय ज्ञान की सैद्धांतिकी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। किंतु उपनिवेशवाद ने आने के बाद हमारी ऐसी मानसिक दशा बनाई कि हम एक ऐसे एम्नेसिया का शिकार हो गए, कि अपने ही ज्ञान शक्ति को भूल गए। आज जब देरिदा बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन के सिद्धांतों की चर्चा करते हैं या हमारे शून्यवाद के विमर्शों को जब पश्चिमी चिंतक महत्व देते हैं तब उनके महत्व का हमें पता चलता है।