सबसे पहले मैंने अपने दोस्त के साथ पुणे के चांदनी चौक इलाके में एथलेटिक्स से जुड़ा एक सेंटर शुरू किया। चूंकि हम दोनों एथलीट हैं, ऐसे में हमारा मकसद इस सेंटर पर व्यावसायिक रूप से खेलने वाले बच्चों को एथलेटिक्स का उन्नत प्रशिक्षण देना था।
इसके साथ मैं पुणे की सोसायटियों में भी खेलों के प्रति जागरुकता से जुड़े कई कार्यक्रम चलाने लगा, इसके लिए हम थोड़ी फीस भी लेते थे। प्राइवेट स्कूलों के साथ काम करते हुए मुझे एहसास हुआ कि ये बच्चे सिर्फ मस्ती के लिए खेलते हैं। इनमें से कोई भी खेल को करियर के रूप में अपनाना नहीं चाहता, जबकि मैं और मेरा दोस्त चाहते थे कि बच्चे प्रोफेशनल एथलीट बनें। हमें पैसा तो मिल रहा था, लेकिन हमारा मकसद पूरा नहीं हो रहा था।