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कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की हिस्सेदारी

रिजवान अंसारी Published by: Raman Singh Updated Thu, 31 Oct 2019 07:46 AM IST
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रिजवान अंसारी

हाल ही में क्रेडिट सुइस नामक स्विस संगठन ने कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की स्थिति पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट की मानें, तो भारत में महिलाओं के लिए कॉरपोरेट की दुनिया अब भी बेहद सिमटी हुई है। दुनिया भर के 56 देशों की तीन हजार कंपनियों का सर्वेक्षण किया गया है, जिसमें भारत को 23वें पायदान पर रखा गया है। रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच सालों में कंपनी की बोर्ड टीम में महिलाओं की भागीदारी में केवल 4.3 फीसदी का इजाफा हुआ है। वरिष्ठ प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी 2016 में महज 6.9 फीसदी थी। लेकिन, थोड़े इजाफे के साथ अब वह 8.5 फीसदी हो गई है।



भारतीय कंपनियों में महिला सीईओ (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) का प्रतिनिधित्व केवल दो फीसदी है, जबकि सीएफओ (मुख्य वित्तीय अधिकारी) के पद पर महिलाओं की भागीदारी महज एक फीसदी है। एशिया प्रशांत क्षेत्र में महिला सीईओ के मामले में थाईलैंड पहले, मलयेशिया दूसरे और फिलिपींस तीसरे स्थान पर है। जबकि भारत रैंकिंग लिस्ट में नीचे से तीसरे पायदान पर है। इसी तरह, महिला सीएफओ के मामले में भारत नीचे से दूसरे स्थान पर है। 15 फीसदी महिला सीईओ के साथ सिंगापुर और इटली दुनिया भर में सबसे आगे हैं। रिपोर्ट में साफ तौर पर यह कहा गया है कि आईटी के 80 फीसदी प्रमुख पुरुष हैं। रिपोर्ट की मानें तो, महिलाओं को निर्णय लेने से संबंधित भूमिका में बहुत कम मौके दिए जा रहे हैं। जहां तक लैंगिक असमानता का सवाल है, तो हालिया वर्षों में जारी दूसरे सूचकांकों में भी भारत की स्थिति बेहतर नहीं रही है। विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी जेंडर गैप इंडेक्स 2018 में भारत को 108 वां स्थान मिला था, जबकि इसमें 149 देशों को शामिल किया गया था। इसी तरह, लैंगिक असमानता रिपोर्ट 2018 में 129 देशों की सूची में भारत को 95वें पायदान पर रखा गया है। अमूमन इस तरह की रिपोर्ट्स आर्थिक अवसर, स्वास्थ्य और पोषण, राजनीतिक सशक्तीकरण, शिक्षा की प्राप्ति आदि जैसे मापदंडों के आधार पर तैयार की जाती हैं।


जाहिर है, ये रैंकिंग इन मुद्दों पर हमारे पिछड़ेपन का एक आईना है। दूसरी ओर समाज और पारिवारिक स्तर पर भी महिलाओं की दयनीय स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन, जहां तक कॉरपोरेट जगत का सवाल है, तो भारत सरकार ने महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए पहल की है। 2013 में व्यवसायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के मकसद से कंपनी अधिनियम में इस बात को जरूरी किया गया था कि कंपनी के बोर्ड में कम-से-कम एक महिला डायरेक्टर हों। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में जमीनी स्तर पर अभी और काम करने की जरूरत है, क्योंकि इस कानून का अभी तक पूरा लाभ नहीं मिला है। एक आंकड़ा यह भी है कि कंपनियों के बोर्ड में शामिल करीब 25 फीसदी महिलाएं प्रमोटर फैमिली की हैं। लिहाजा, पारदर्शिता का अभाव हमेशा ही एक बड़ी समस्या रही है। गौर करें तो कानूनी प्रावधान का लाभ भी मिला है। बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में महिलाओं को जगह देने वाली कंपनियों की शेयर होल्डिंग वैल्यू बेहतर हुई है।


पिछले पांच सालों में ऐसी कंपनियों की संख्या में 10 फीसदी की वृद्धि हुई हैै, जिसने बोर्ड में महिलाओं को शामिल किया है। दफ्तरों में लैंगिक असमानता की खाई को पाटना है, तो बोर्ड में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ाना होगा। लैंगिक समानता का सूत्र श्रम सुधारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से भी जुड़ा है, फिर चाहे कामकाजी महिलाओं के लिए समान वेतन सुनिश्चित करना हो या सुरक्षित नौकरी की गारंटी देना। बहरहाल, कॉरपोरेट जगत को बड़ा दिल दिखाते हुए कंपनी अधिनियम के नियमों का अनुपालन करने की जरूरत है, ताकि महिला भागीदारी के सपने को साकार किया जा सके।

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