धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं के अधिक संकटग्रस्त होने के बीच हाल ही में वैज्ञानिकों ने नई चेतावनी जारी की है। इसे डूमस्डे क्लाक चेतावनी कहा जा रहा है। विश्व में ‘डूमस्डे क्लॉक’ अपनी तरह की एक प्रतीकात्मक घड़ी है, जिसकी सुइयों की स्थिति के माध्यम से यह दर्शाने का प्रयास किया जाता है कि विश्व किसी बहुत बड़े संकट की आशंका के कितने नजदीक है। इस घड़ी का संचालन ‘बुलेटिन ऑफ एटोमिक साइंटिस्ट्स’ नामक वैज्ञानिक संस्थान द्वारा किया जाता है। इसके परामर्शदाताओं में 15 नोबेल पुरस्कार विजेता भी हैं। ये सभी मिलकर प्रति वर्ष तय करते हैं कि इस वर्ष घड़ी की सुइयों को कहां रखा जाए।
इस घड़ी में रात के 12 बजे को धरती पर बहुत बड़े संकट का पर्याय माना गया है। घडी की सुइयां रात के 12 बजे के जितने नजदीक रखी जाएगी, उतने ही बड़े संकट से धरती (व उसके लोगों व जीवों) के संकट की स्थिति मानी जाएगी। 2024 में इन सुइयों को (रात के) 12 बजने में 90 सेकंड पर रखा गया है। संकट के प्रतीक 12 बजे के समय से इन सुइयों की इतनी नजदीकी 2023-24 के अतिरिक्त कभी नहीं रही। दूसरे शब्दों में, यह घड़ी दर्शा रही है कि इस समय धरती किसी बहुत बड़े संकट के सबसे करीब है।
‘डूमस्डे घड़ी’ के वार्षिक प्रतिवेदन में इस स्थिति के तीन कारण बताए गए हैं। पहली वजह यह है कि जलवायु बदलाव का संकट बढ़ रहा है। जलवायु बदलाव नियंत्रित करने की संभावनाएं समग्र रूप से धूमिल हुई हैं। दूसरी वजह यह है कि परमाणु हथियार नियंत्रित करने के समझौते कमजोर हुए हैं, जिससे परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ा है। तीसरी वजह यह है कि ए.आई. (आर्टीफिशयल इंटेलीजेंस) व जेनेटिक इंजीनियरिंग का बहुत दुरुपयोग हो रहा है, जिसका सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इन तीन कारणों के मिले-जुले असर से आज विश्व बहुत बड़े संकट की आशंका की दहलीज पर पहुंच चुका है। और इस संकट को कम करने के लिए तुरंत कदम उठाना जरूरी है। सवाल यह है कि क्या ‘डूमस्डे घड़ी’ के इस अति महत्वपूर्ण संदेश को विश्व नेतृत्व समय रहते समझेगा? हाल के वर्षों में यह निरंतर स्पष्ट होता रहा है कि अब तो धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में है। जिन कारणों से हजारों वर्षों तक धरती पर विविधतापूर्ण जीवन पनप सका, वे आधार ही संकटग्रस्त हो चुके हैं।
इन अति गंभीर समस्याओं के समाधान को सर्वाधिक महत्व पूरे विश्व में मिले, इसे ध्यान में रखते हुए ‘धरती रक्षा अभियान’ (सेव द अर्थ कैंपेन) आरंभ किया गया है। इस अभियान का व्यापक उद्देश्य धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा करना है। इसके दो विशिष्ट उद्देश्य हैं–पहला, धरती से सभी परमाणु हथियार व महाविनाशक हथियार समाप्त हों व दूसरे, धरती पर तापमान वृद्धि को तय मानक तक सीमित रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं। इस अभियान का प्रथम प्रयास यह है कि मौजूदा दशक (2020-30) को वैश्विक स्तर पर ‘धरती रक्षा दशक’ के रूप में घोषित किया जाए। एक बड़ा सवाल हमारे सामने है कि आखिर इन गंभीर संकटों को समय रहते कैसे कम किया जाए। समय सीमा का सवाल इस कारण भी बहुत बड़ा है, क्योंकि जलवायु बदलाव के साथ टिपिंग पॉइंट भी जुड़े हैं। एक बार यह सीमा पार हो गई, तो फिर स्थितियां नियंत्रण से बाहर निकल सकती हैं। विश्व के शीर्ष विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए हमारे पास बस एक दशक बचा है।
एक बड़ी जरूरत इस बात की है कि धरती के जीवन पर मंडरा रहे अभूतपूर्व संकट की समझ अधिक लोगों तक पहुंचे। यह समझ सही परिप्रेक्ष्य में अधिक लोगों तक पहुंचेगी, तभी लोग अधिक संख्या में आगे आएंगे। इस समय इन मुद्दों की गंभीरता की जानकारी रखने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। इन मुद्दों को न्याय व लोकतंत्र के मुद्दों से जोड़कर व्यापक समझ बनानेवाले लोगों की संख्या तो और भी कम है। ऐसी समझ बनाकर हमें धरती की रक्षा की वह राह निकालनी है, जो समता व सादगी, न्याय व लोकतंत्र की राह है। इस समय संकट और समाधान की सही समझ को अधिक लोगों तक पहुंचाना और उन्हें समाधान के प्रयासों से जोड़ना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।