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समाज: कोविड ने बदल दी दुनिया, छोटे शहरों का रुख करती जिंदगी

अद्वैता काला
Updated Thu, 22 Feb 2024 06:59 AM IST

सार

कोविड के बाद एक मौन आंदोलन के तहत लोग बड़े से छोटे शहरों में रहना ज्यादा पसंद करने लगे हैं, जहां वे सामुदायिक भावना को शहरी अराजकता पर तरजीह देते हुए कामयाबी को नई तरह से परिभाषित कर रहे हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


हालांकि मैं इन दोनों शहरों में आती-जाती रहती हूं, लेकिन अब मैं अपना ज्यादातर समय देहरादून में ही बिताती हूं, जो एक छोटा अनोखा शहर है और शैक्षणिक संस्थानों, सेना और सेवानिवृत्त लोगों का प्रमुख केंद्र भी है। यहां जिंदगी की रफ्तार थोड़ी धीमी है, लेकिन हवा अपेक्षया साफ है। कोविड के दौरान, विशेष रूप से डेल्टा वायरस की लहर के समय, जब अस्पतालों में बिस्तर और ऑक्सीजन की कमी हो गई थी, लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया था कि बड़े शहरों में रहने के नुकसान ज्यादा हैं।


सामान्य दिनों में लंबा ट्रैफिक जाम, वायु गुणवत्ता की बदतर स्थिति, चरम मौसमी स्थितियां और व्यस्त व आक्रामक सामाजिक माहौल ऐसी चीजें हैं, जो लोगों को बड़े शहरों से दूर कर रही हैं। कोविड काल के बाद प्रचलित मिश्रित कार्य-संस्कृति का मतलब यह भी है कि जो लोग खर्च उठाने में सक्षम हैं, वे तेजी से स्थानांतरित हो रहे हैं। चाहे राजमार्गों का विकास हो या उड़ान योजना, पिछले दस वर्षों में बढ़ी कनेक्टिविटी ने भारत को आपस में अधिक जोड़ा है। इसके साथ ही इंटरनेट ने भी दूरियां कम की हैं। और यह सब इतनी तेजी से बदला है कि हैरानी होती है।


एक दशक पहले जब मैं टीवी बहस में शामिल होती थी, तो कैमरामैन, लाइटमैन और साउंडमैन के साथ एक बड़ी ओबी वैन आती थी। वे लोग मेरे घर में लाइट और कैमरा लगाते थे, मुझे लाइव टीवी स्टूडियो से जोड़ते थे। आज मैं चाहे दुनिया में कहीं भी रहूं, जूम के माध्यम से टीवी बहस में शामिल हो सकती हूं। यह एक ऐसा बदलाव है, जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। अस्तित्व के संकट और परिस्थितिवश मजबूरी में लोग बड़े शहरों में रहने के लिए बाध्य होते थे, लेकिन अब कई लोग ऐसी बाध्यता महसूस नहीं करते हैं।


देहरादून में मेरे अपार्टमेंट में एक नई बात यह है कि यहां बहुत से वरिष्ठ नागरिक हैं, लेकिन तीस से चालीस की उम्र के लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो बड़े से छोटे शहरों में शहरी परिप्रेक्ष्य लेकर आए हैं और साथ ही संतोष की हवा भी। भारत में हुए तीव्र विकास से उन लोगों के लिए छोटे शहरों में रहना आसान हो गया है, जो बड़े शहरों में रहने के आदी हैं। साथ ही स्वास्थ्य सुविधाओं में भी काफी सुधार हुआ है। जीवन-शैली में बदलाव अब उतना कठोर नहीं रह गया है, जितना पहले माना जाता था। असल में जीवन-यापन की लागत सस्ती हो गई है और पैसे के लिहाज से अचल संपत्ति का मूल्य बढ़ गया है। शिक्षा के प्रचुर अवसर हैं और सार्वजनिक परिवहन सुविधाजनक है।


 मेरे बचपन में दिल्ली से देहरादून पहुंचने में रुकते हुए सात से नौ घंटे लगते थे, लेकिन अब मुश्किल से चार घंटे लगते हैं तथा इसमें और कमी होने वाली है। गुरुग्राम से जयपुर मात्र तीन घंटे दूर है और बीस साल पहले गाड़ी से इतनी दूरी तय करने में पांच घंटे लगते थे। छोटे शहर सामाजिक रूप से घुलने-मिलने के भी काफी अवसर प्रदान करते हैं, लोगों के पास काफी समय होता है और वे एक-दूसरे का साथ ढूंढते हैं।


बड़े शहरों, जहां मानव अस्तित्व एक निश्चित संकीर्णता में घिर गया है, के विपरीत देश के छोटे शहरों और कस्बों में समुदाय की अवधारणा अब भी काफी जीवित है। जब यह सदी शुरू हुई होगी, तो शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भारत के लोग छोटे शहरों में जाना चाहेंगे, लेकिन आज हम छोटे शहरों की तरफ रुख कर रहे हैं। जीवन की गुणवत्ता, यात्रा में आसानी और ई-कॉमर्स-इन सबने इस बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया है।
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अब चुनौती यह है कि छोटे शहरों की गुणवत्ता बनाकर रखी जाए और इन्हें शहरी फैलाव न बनने दिया जाए। विवेकपूर्ण शासन से ऐसा संभव है। इसके अलावा यह प्रवासन भारतीयों की प्राथमिकता और मूल्यों में ठोस बदलाव को भी दर्शाता है, जो इस पारंपरिक आख्यान को चुनौती देता है कि सफलता महानगरीय जीवन का पर्याय है। भारत के लोगों में आत्मबोध और सांस्कृतिक जागरूकता का विकास तेजी से हो रहा है। पश्चिमी जीवन-शैली का अंधानुकरण थम गया है और लोगों ने उस जीवन-शैली की विफलता को पहचान लिया है। समुदाय और परिवार पर ध्यान केंद्रित करने वाली भारतीय जीवन-शैली ऐसी समृद्धि लाती है, जिसकी गणना नहीं की जा सकती।


मानसिक स्वास्थ्य की मूक महामारी से बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए आधुनिक समय में यह बेहद महत्वपूर्ण हो गया है कि हम अपने मूल्यों के साथ तालमेल बिठाएं और उसे समृद्ध करें। और यह पूरी तरह संभव है। लंबी जीवन-प्रत्याशा वाले भौगोलिक क्षेत्रों यानी ब्लू जोन्स का अध्ययन दर्शाता है कि इसका एक प्रमुख कारण सामुदायिक जीवन जीना और दूसरे मनुष्यों के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़े रहने से लंबा और स्वस्थ जीवन जीने में मदद मिलती है- फोन या इंटरनेट पर नहीं। जैसे-जैसे ज्यादा भारतीय सफलता को फिर से परिभाषित करेंगे और चूहा-दौड़ से अधिक कल्याण को प्राथमिकता देंगे, बड़े शहरों से छोटे शहरों में जाने का चलन बढ़ेगा, देश के जनसांख्यिकी स्वरूप में बदलाव होना जारी रहेगा। यह जीवन के प्रति अधिक संतुलित और समग्र दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जो इस पारंपरिक ज्ञान को चुनौती देता है कि शहरीकरण ही समृद्धि का अंतिम रास्ता है।


छोटे शहरों की शांति को अपनाकर अब लोग कामयाबी की नई परिभाषा तलाश रहे हैं, जो अराजक शहरी जीवन-शैली के ऊपर खुशी, स्वास्थ्य और सामुदायिक भावना को तवज्जो देती है। गांधी जी ने जिस भारत को गांवों में बताया था, वह नए समय में छोटे-छोटे शहरों में भी दिखाई देता है।

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